#MNN24X7 कथा आरंभ
उत्तर भारत के एक शांत कस्बे—चंदनपुर—में होली की तैयारियां पूरे जोरों पर थीं। गलियों में रंग, पिचकारियां, ढोलक की थाप और बच्चों की हंसी गूंज रही थी। हर घर में पकवान बन रहे थे। लेकिन इसी खुशियों के बीच एक घर ऐसा भी था जहां उम्मीदों की रौशनी कुछ ज्यादा ही चमक रही थी।
यह घर था आदित्य वर्मा का।
आदित्य शहर के एक नामी कॉलेज में बीबीए का छात्र था। पढ़ाई में तेज, व्यवहार में सरल और दोस्तों के बीच बेहद लोकप्रिय।
होली की छुट्टियों में वह अपने घर लौटा था।
मां ने गले लगाकर कहा—
“इस बार ज्यादा दिन रुकना बेटा… तेरी बहन की शादी भी तो है अगले महीने।”
आदित्य मुस्कुराया—
“इस बार पूरा मजा लेंगे मां… होली भी और शादी भी।”
घर में सच में रौनक थी। बहन रीमा की शादी तय हो चुकी थी। हर दिन नई-नई तैयारियां, रिश्तेदारों का आना-जाना, हंसी-मजाक।
लेकिन किसे पता था कि यह खुशी बहुत जल्द मातम में बदल जाएगी।
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शनिवार का दिन था।
दोपहर करीब 1:30 बजे आदित्य के फोन पर कॉल आया।
“भाई, बाहर आओ… मिलना है,” आवाज थी रोहन की।
रोहन और विकास—दोनों आदित्य के बचपन के दोस्त थे। तीनों ने साथ खेला, साथ पढ़ा, साथ सपने देखे।
आदित्य ने जल्दी से चप्पल पहनी।
मां ने पूछा—
“कहां जा रहे हो?”
“बस दोस्तों से मिलकर आता हूं,” उसने जवाब दिया।
यह उसकी आखिरी मुस्कान थी, जो उसके परिवार ने देखी।
—
आदित्य घर से निकला और गली के मोड़ पर रोहन और विकास मिल गए।
“चलो, थोड़ी दूर चलते हैं,” रोहन ने कहा।
तीनों धीरे-धीरे कस्बे से बाहर की तरफ बढ़ने लगे।
रास्ते में हल्की बातचीत हुई, लेकिन आदित्य को कुछ अजीब लगा।
विकास असामान्य रूप से चुप था।
“क्या हुआ? इतने शांत क्यों हो?” आदित्य ने पूछा।
रोहन ने बात टाल दी—
“कुछ नहीं यार… बस थोड़ा टेंशन है।”
आदित्य ने ज्यादा जोर नहीं दिया।
उसे नहीं पता था कि यह “टेंशन” उसकी जिंदगी का आखिरी अध्याय लिखने वाला है।
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करीब 3 बजे के आसपास, कस्बे के बाहर एक सुनसान जगह पर तीनों रुक गए।
वहां कोई नहीं था।
अचानक रोहन ने कहा—
“आदित्य, वो पैसे कब लौटाओगे?”
आदित्य चौंका—
“कौन से पैसे?”
विकास ने गुस्से में कहा—
“जो तुमने हमें दिए थे… अब वापस मांग रहे हो?”
आदित्य ने समझाने की कोशिश की—
“यार, वो पैसे मैंने मदद के लिए दिए थे… जब हो सके दे देना।”
लेकिन बात बिगड़ चुकी थी।
रोहन की आंखों में एक अजीब चमक थी।
अचानक…
धांय!
एक गोली की आवाज गूंजी।
आदित्य जमीन पर गिर पड़ा।
गोली उसकी गर्दन में लगी थी।
उसकी आंखों में अविश्वास था—
“तुम…?”
शब्द अधूरे रह गए।

—
रोहन और विकास घबरा गए।
उन्होंने सोचा था कि शायद डराने के लिए गोली चलाएंगे…
लेकिन सब कुछ खत्म हो चुका था।
“अब क्या करें?” विकास कांपते हुए बोला।
रोहन ने कहा—
“अस्पताल ले चलते हैं… शायद बच जाए।”
वे आदित्य को किसी तरह उठाकर बाइक पर लादकर कस्बे के अस्पताल की तरफ ले गए।
लेकिन अस्पताल के बाहर पहुंचते ही…
डर ने इंसानियत को हरा दिया।
उन्होंने आदित्य को वहीं छोड़ दिया… और भाग गए।
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शाम को करीब 4 बजे, आदित्य के घर पर खबर पहुंची—
“आपका बेटा अस्पताल के पास पड़ा है… हालत गंभीर है।”
परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई।
जब तक वे पहुंचे…
सब खत्म हो चुका था।
मां चीख पड़ी—
“मेरा बेटा…!”
बहन रीमा वहीं बेहोश हो गई।
जिस घर में शादी की तैयारी थी… वहां मातम छा गया।
—
पूरा चंदनपुर सन्न था।
लोग एक ही सवाल पूछ रहे थे—
“दोस्त ऐसा कैसे कर सकते हैं?”
गांव में चर्चाएं शुरू हो गईं—
“सुना है पैसों का मामला था…”
“कहते हैं आदित्य ने दो लाख रुपये दिए थे…”
लेकिन सच्चाई क्या थी, कोई नहीं जानता था।
—
पुलिस मौके पर पहुंची।
एक खोखा बरामद हुआ।
पास के एक दुकान के सीसीटीवी कैमरे में कुछ फुटेज मिली—
जिसमें रोहन और विकास, आदित्य को ले जाते हुए दिखे।
डीएसपी अभिषेक राणा ने कहा—
“अगर हत्या की नीयत थी, तो उसे अस्पताल क्यों लाए?”
यह सवाल सबको परेशान कर रहा था।
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जांच में धीरे-धीरे सच्चाई सामने आने लगी।
रोहन और विकास कर्ज में डूबे हुए थे।
आदित्य ने उनकी मदद के लिए पैसे दिए थे।
लेकिन जब उन्होंने पैसे लौटाने में देरी की, तो उनके मन में डर और लालच दोनों पैदा हो गए।
उन्हें लगा—
“अगर आदित्य नहीं रहेगा, तो पैसे भी नहीं लौटाने पड़ेंगे।”
और यही सोच… एक दोस्त को हत्यारा बना गई।
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कुछ दिनों बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों को पकड़ लिया।
पूछताछ में वे टूट गए।
रोहन रोते हुए बोला—
“हमने सोचा नहीं था कि वो मर जाएगा…”
विकास चुप था।
उसकी आंखों में सिर्फ खालीपन था।
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रीमा की शादी टल गई।
घर में अब भी सन्नाटा था।
मां हर दिन दरवाजे की तरफ देखती—
“शायद मेरा बेटा वापस आ जाए…”
लेकिन सच… कभी वापस नहीं आता।
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यह घटना सिर्फ एक हत्या नहीं थी।
यह एक सवाल थी—
क्या दोस्ती अब भरोसे के लायक नहीं रही?
क्या पैसों के लिए इंसान इतना गिर सकता है?
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चंदनपुर में होली आई…
रंग भी उड़े…
लेकिन एक घर ऐसा था जहां आज भी सफेद सन्नाटा था।
जहां हर रंग… खून के लाल में बदल चुका था।
—
दोस्ती का नाम था, मगर साज़िश बन गई,
मुस्कान थी जो कभी, अब आह बन गई।
जिसे अपना समझा, उसी ने वार किया,
जिंदगी की किताब… अधूरी कहानी बन गई।

