-टीबी को परास्त करने के बाद विभाग की मदद से चला रहे मुहिम।

-पांच साल पहले सतीघाट प्रखंड के 46 वर्षीय मनोज खुद हुए थे टीबी पीड़ित।

-विभागीय परामर्श व लगातार दवा खाने के बाद टीबी पर पाया काबू।

#MNN@24X7 दरभंगा,1 दिसम्बर। सतीघट प्रखंड के नैनाघाट निवासी 40 वर्षीय मनोज कुमार झा वर्षों से टीबी  उन्मूलन को लेकर अभियान चला रहे हैं. विभागीय सहायता से प्रत्येक शनिवार को विभिन्न प्रखंडों में नुक्कड़ नाटक कर टीबी  उन्मूलन  के लिए काम कर रहे हैं. अपने अनुभवों को ताकत बनाकर टीबी मरीज़ों को जागृत कर रहे हैं . एक समय था जब पांच साल पहले 2017 में मनोज इस रोग से खुद ग्रसित हो गए थे. हरियाणा में प्राइवेट नौकरी छोड़कर घर आना पड़ा. टीबी से पीड़ित पुरानी यादों के दर्द को ताकत बनाकर लोगों को जागरूक कर रहे है। खासकर  सतीघाट इलाके के दूर दराज गाँव मे जाकर लोगो को टीबी से बचाव व किसी प्रकार का लक्षण होने पर तुरन्त सतीघाट पीएचसी पहुँचने की सलाह देते है। साथ ही आसपास के लोगो को टीबी की जानकारी देना नही भूलते है। यहां तक कि अगर कोई व्यक्ति अगर जांच से पीछे हटने की कोशिश करता है तो उसे अपने बारे में बताकर जांच व उपचार के लिए प्रेरित करते है। इस प्रकार मनोज लेबर क्लास जो रोजाना मेहनत करते है उसे ज़रूर टीबी के बारे में ज़रूर बताते है। इस प्रकार अब तक सैकड़ों लोगों को टीबी बीमारी से निजात पाने में मेहनत की है। वह सिलसिला आज भी जारी है।

खुद हो गए थे पीड़ित

मनोज खुद टीबी से ग्रसित हो गए थे। पांच साल पहले पहली बार लक्षण होने पर कुशेश्वरस्थान पीएससी में चिकित्सकों से परामर्श लिया. वहां से टीबी  की पुष्टि के लिए डीएमसीएच भेज दिया गया. जांच उपरांत टीबी  होने की जानकारी मिली. चिकित्सकों ने मनोज को इस रोग से निजात पाने के लिए लगातार दवा खाने की सलाह दी. लिहाजा छह माह तक दवा चली. मनोज विभागीय मदद से लगातार छह महीना तक दवा लेने व उचित परामर्श प्राप्त कर टीबी  को परास्त करने में कामयाबी पाई. उसके बाद अपने अनुभवों को अन्य पीड़ितों के साथ साझा कर टीबी  उन्मूलन अभियान में अपनी भागीदारी शुरू की. यह मुहिम अभी भी जारी है.

भट्ठा पर कार्यरत  संजय को समझाने के बाद फिर शुरू की दवा–

वर्तमान में मनोज बिरौल बीएससी में टीबी  मरीजों को मदद कर रहे हैं. पीएचसी में आने पर सभी मरीजों को उचित परामर्श देते हैं. इससे पूर्व मनोज सतीघाट पीएससी में एक साल तक टीबी  चैंपियन के रूप में कार्य कर चुके हैं. मनोज ने बताया कि टीबी  को लेकर समाज में भ्रांतियां फैली हुई हैं . सर्दी खांसी होने पर लोग जांच करने से परहेज करते हैं. जांच के बाद टीबी  की पुष्टि होने पर दवा खाने से इंकार कर देते हैं. यह सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है. इसे दूर करने की कोशिश कर रहे हैं . मनोज ने कहा कि पिछले 2 माह पूर्व गौड़ाबौराम क्षेत्र के संजय महतो नामक मजदूर  ईट भट्टा पर काम करता था. इस दौरान उसे सर्दी खांसी होने पर जांच कराई गई तो टीबी  निकला. संजय को निःशुल्क दवा के लिए पीएचसी बुलाया गया, लेकिन वह नहीं आया. दवा शुरू नहीं करने पर उसे फिर से संपर्क किया गया. काफी समझाने के बाद वह फिर से दवा खाने को राजी हो गया. वहीं  हिरनी की 22 वर्षीय लड़की को भी टीबी  की दवा खाने में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा. उसे भी दवा की महत्ता बताई गई. नियमित  दवा खाने के बाद वह युवती भी अब स्वस्थ है . साथ ही संजय सामान्य रूप से भट्ठा पर कार्य कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहा है.

टीबी  पीड़ितों के सहयोग नहीं देने के बावजूद, नहीं  मानते हार- 

मनोज ने कहा कि टीबी  उन्मूलन को लेकर दूर दराज के क्षेत्रों में जागरूकता लानी जरूरी है. बताया कि अधिकांश लोग टीबी  को छुपाते हैं. जांच कराने के लिए दूसरे प्रखंड एवं जिला का सहारा लेते हैं, ताकि कोई पहचान ना सके. लेकिन अंत में विभागीय निर्देश से मरीजों को चिह्नित कर लिया जाता है. उनके घर जाने पर टीबी  केंद्र  के कर्मियों को अपमानित होना पड़ता है. पीडित परिवार के सदस्य उनको कहते हैं कि यहां क्यों आए हैं या कोई टीबी  पीड़ित मरीज नहीं है. आप लोग चले जाएं, लेकिन हम लोग हार नहीं मानते. किसी एक सदस्य को  कोने में ले जाकर काफी समझाने के बाद बात बनती है. उसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य जांच कराने को राजी होते  एवं परिवार के टीबी  पीड़ित सदस्य लगातार दवा खाने को रजामंद होते हैं. मनोज ने कहा टीबी  को खत्म करने के लिए सभी का साथ जरूरी है.