#MNN@24X7 दरभंगा। अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव हिला देने वाले अदम्य साहस, पराक्रम व शौर्य के प्रतीक, महान स्वतंत्रता सैनानी बाबू वीर कुँवर सिंह की 245 वीं जन्म जयंती पर उनको याद करते हुए उनके तैल्य चित्र पर माला पहना कर फिर दीप से आरती की गई।
वीर कुंवर सिंह का जन्म 13 नवम्बर 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव के एक उज्जैन परमार क्षत्रिय जमीनदार परिवार में हुआ जो मालवा के प्रसिद्ध राजा भोज के वंशज है। इसी परमार क्षत्रिय वंश में ही महान प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य भी हुए जिनके राज में विक्रम संवत् की शुरुआत हुई थी। वे सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही और महानायक थे।
अन्याय विरोधी व स्वतंत्रता प्रेमी बाबू कुंवर सिंह कुशल सेना नायक भी थे। दुनिया में इनको 80 वर्ष की उम्र में भी लड़ने तथा विजय हासिल करने के लिए जाना जाता है। 1857 में अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर कदम बढ़ाया। बिहार की दानापुर रेजिमेंट, बंगाल के बैरकपुर और रामगढ़ के सिपाहियों ने बगावत कर दी। मेरठ, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झांसी और दिल्ली में भी आग भड़क उठी। ऐसे हालात में बाबू कुंवर सिंह ने अपने सेनापति मैकु सिंह एवं राष्ट्र भक्त सैनिकों का नेतृत्व किया।
27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और अन्य सभी जाती – धर्म के साथियों के साथ मिलकर आरा नगर पर बाबू वीर कुंवर सिंह ने कब्जा कर लिया। अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी भोजपुर लंबे समय तक स्वतंत्र रहा। जब अंग्रेजी फौज ने आरा पर हमला करने की कोशिश की तो बीबीगंज और बिहिया के जंगलों में घमासान लड़ाई हुई। बहादुर स्वतंत्रता सेनानी जगदीशपुर की ओर बढ़ गए। आरा पर फिर से कब्जा जमाने के बाद अंग्रेजों ने जगदीशपुर पर आक्रमण कर दिया।
बाबू कुंवर सिंह और अमर सिंह को जन्म भूमि छोड़नी पड़ी। अमर सिंह अंग्रेजों से छापामार लड़ाई लड़ते रहे और बाबू कुंवर सिंह रामगढ़ के बहादुर सिपाहियों के साथ बांदा, रीवां, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर एवं गोरखपुर में युद्ध के लड़ते रहे।और पुनः जगदीशपुर पर बाबु कुँवर सिंह का क़ब्ज़ा हो गया। ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने उनके बारे में लिखा है, ‘उस बूढ़े राजपूत ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अद्भुत वीरता और आन – बान के साथ लड़ाई लड़ी। यह गनीमत थी कि युद्ध के समय कुंवर सिंह की उम्र अस्सी के करीब थी। अगर वह जवान होते तो शायद अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता।
80 सालों की हड्डी में जागा जोश पुराना था, सब कहते हैं कुंवर सिंह बड़ा वीर मर्दाना था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अपराजेय योद्धा बाबु वीर कुंवर सिंह की जयंती पर पुनः उनको एवं उनके सभी राष्ट्रभक्त साथियों के साथ शत शत नमन। बाबु वीर कुँवर सिंह अमर रहे।