#MNN24X7 देवपुरा (बेनीपट्टी), मधुबनी।, वक्त के साथ न केवल पीढ़ियां बदलती हैं, बल्कि जीवन की प्राथमिकताएं भी बदल जाती हैं। जहां एक ओर शहर विकास की रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गांव धीरे-धीरे वीरान होते जा रहे हैं। मिथिला में गांव से शहर की ओर हो रहे पलायन की यह तस्वीर आज भी उतनी ही भयावह है, जितनी वर्षों पहले थी।

दरभंगा से कुछ ही दूरी पर स्थित देवपुरा गांव (प्रखंड बेनीपट्टी, जिला मधुबनी) में जब हमारे संवाददाता ने ग्रामीणों से बातचीत की, तो एक ही सवाल सामने आया—आखिर लोग गांव छोड़कर शहरों और दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर क्यों हैं?

मगर इस सवाल का जवाब जितना सीधा था, उतना ही निराशाजनक भी।

ग्रामीणों के अनुसार, देवपुरा गांव के लगभग 80 प्रतिशत पुरुष रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में अपने मूल निवास से बाहर पलायन कर चुके हैं। उनका कहना है कि बिहार में आज भी वे बुनियादी व्यवस्थाएं पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं, जो एक सम्मानजनक जीवन के लिए आवश्यक मानी जाती हैं। रोजगार की कमी आज के युवाओं के लिए सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है।

यह समस्या केवल एक गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे बिहार की सच्चाई को दर्शाती है। राज्य के कई ऐसे परिवार हैं, जहां आज भी नियमित बिजली, शुद्ध पेयजल और स्थायी आय का अभाव है। जब रोजमर्रा की जरूरतें ही पूरी नहीं हो पातीं, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की बेहतर व्यवस्था की कल्पना करना कठिन हो जाता है।

ग्रामीणों का कहना है कि जिस राज्य में सड़क से लेकर पुल तक के निर्माण में अनियमितताएं आम हों, जहां अपराध, हत्या और अपहरण की घटनाएं सुर्खियों में रहती हों, वहां शिक्षा व्यवस्था और नीतियों का आकलन सहज ही किया जा सकता है। यही कारण है कि लोग मजबूरी में राज्य से बाहर जाते हैं।
हालांकि, पलायन के बाद भी उनका जीवन आसान नहीं होता। जो सुविधाएं उन्हें अपने पैतृक गांव में सहज रूप से मिल जाती थीं, वही सुविधाएं महानगरों में पाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।

स्थानीय लोगों का मानना है कि बिहार में बड़े उद्योगों और प्रतिष्ठित कंपनियों का निवेश न होना भी पलायन का बड़ा कारण है। यदि राज्य में उद्योग स्थापित होते, तो लोग अपने परिवार के साथ अपने ही प्रदेश में रहकर रोजगार पा सकते थे।

महंगाई के इस दौर में बिहार में आय के स्रोत सीमित हैं। हालांकि, ग्रामीण यह भी स्वीकार करते हैं कि इसके लिए केवल सरकार को दोष देना उचित नहीं होगा। समाज की भी यह जिम्मेदारी है कि वह अपने राज्य के विकास के लिए ठोस पहल करे। अक्सर लोग यह मानकर निष्क्रिय हो जाते हैं कि सरकार ही सब कुछ करेगी, जबकि आजादी के 78 वर्ष बाद भी कई बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।

ग्रामीणों ने यह भी याद दिलाया कि बिहार ने जंगलराज जैसे कठिन दौर को देखा है। उस समय की तुलना में आज शिक्षा व्यवस्था में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन बेरोजगारी कहीं अधिक तेजी से बढ़ी है।

अब समय केवल विचार करने का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का है। बदलते समय के साथ बिहार के विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और कानून-व्यवस्था को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन वर्तमान हालात में अराजकता, अपराध और भ्रष्टाचार विकास के मार्ग में बड़ी बाधा बने हुए हैं।

ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि सरकार को कठोर और प्रभावी निर्णय लेने होंगे, ताकि व्यवस्था पर मजबूत नियंत्रण स्थापित हो सके और बिहार के लोगों को अपने ही राज्य में सुरक्षित, सम्मानजनक और स्थायी जीवन जीने का अवसर मिल सके।
जब तक यह नहीं होगा, तब तक गांव से शहर की ओर पलायन का यह सिलसिला थमना मुश्किल नजर आता है।
संवाददाता यश चौधरी