#MNN24X7 कथा आरंभ
मिथिला की धरती…
दरभंगा और मधुबनी के बीच बसे छोटे-छोटे गांव…
जहाँ लोग आज भी रिश्तों को सबसे बड़ी संपत्ति मानते हैं।
इसी मिट्टी में जन्म लेती है एक कहानी—
प्यार की, विश्वास की, और उस सच्चाई की जो कभी-कभी सबसे करीब के रिश्तों को भी हिला देती है।
यह कहानी है अभिषेक मिश्रा और नंदिता मिश्रा की।
—
दरभंगा जिले के पास एक गांव था — सोनकी टोला।
वहाँ रहता था एक प्रतिष्ठित परिवार — मिश्रा परिवार।
परिवार के मुखिया थे
शिवनाथ मिश्रा
उनकी पत्नी — सरस्वती देवी
उनका बेटा — अभिषेक मिश्रा
और बेटी — रागिनी
अभिषेक शहर में एक बैंक में नौकरी करता था।
ईमानदार, शांत और जिम्मेदार युवक।
तीन साल पहले उसकी शादी हुई थी नंदिता झा से।
नंदिता मधुबनी जिले के राजनगर की रहने वाली थी।
दोनों की शादी प्रेम विवाह थी।
कॉलेज में दोस्ती हुई…
फिर प्यार…
फिर शादी।
शादी के बाद पूरा परिवार खुश था।
गाँव वाले अक्सर कहते थे—
“मिश्रा जी का घर तो स्वर्ग है।”
—
अभिषेक और नंदिता की जिंदगी बहुत अच्छी चल रही थी।
दो साल बाद उनके दो बच्चे भी हुए—
आरव
और
अनाया
घर में खुशियाँ ही खुशियाँ थीं।
शाम को पूरा परिवार एक साथ बैठकर खाना खाता।
दादी बच्चों को कहानियाँ सुनातीं।
अभिषेक अक्सर कहता—
“हमारा घर ही मेरी दुनिया है।”
लेकिन…
कभी-कभी जिंदगी में सब कुछ अचानक बदल जाता है।
—
कुछ महीनों बाद अभिषेक ने महसूस किया कि नंदिता बदल रही है।
वह पहले की तरह खुश नहीं रहती।
अक्सर मोबाइल पर व्यस्त रहती।
कभी-कभी किसी से छुपकर बात करती।
एक रात अभिषेक ने पूछा—
“किससे बात कर रही थी?”
नंदिता ने कहा—
“मेरी सहेली है।”
अभिषेक ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
लेकिन यह सिलसिला बढ़ता गया।
—
एक दिन रागिनी ने अपने भाई से कहा—
“भैया… भाभी बहुत देर तक फोन पर बात करती हैं।”
अभिषेक चुप हो गया।
उसने सोचा—
शायद यह उसका भ्रम हो।
लेकिन कुछ दिनों बाद उसने मोबाइल में एक नाम देखा—
राघव
उसके मन में सवाल उठने लगे।
—
अभिषेक ने अपने दोस्त प्रदीप झा की मदद ली।
प्रदीप ने नंबर का पता लगाया।
नंबर था—
राघव चौधरी
मधुबनी का रहने वाला।
अब अभिषेक का शक और गहरा हो गया।
—
एक दिन नंदिता ने कहा—
“मैं मधुबनी जा रही हूँ।”
अभिषेक ने कहा—
“ठीक है।”
लेकिन वह चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा।
नंदिता बस से दरभंगा पहुँची।
फिर वह एक होटल के सामने रुकी—
मिथिला पैलेस होटल
अभिषेक का दिल जोर से धड़कने लगा।
—
कुछ देर बाद एक युवक आया।
नंदिता उसे देखकर मुस्कुराई।
दोनों होटल के अंदर चले गए।
अभिषेक के लिए यह दृश्य बिजली की तरह था।
वह गुस्से में होटल के अंदर गया।
कमरा नंबर पूछा।
और दरवाजा खटखटाया।
—
दरवाजा खुला।
सामने खड़ा था—
राघव
अंदर थी—
नंदिता
अभिषेक चिल्लाया—
“यह क्या है?”
नंदिता चुप रही।
लेकिन अचानक बोली—
“यह वैसा नहीं है जैसा तुम सोच रहे हो।”
—
नंदिता रोने लगी।
“राघव मुझे ब्लैकमेल कर रहा है।”
अभिषेक चौंक गया।
राघव हँसने लगा।
“हाँ… मैं ब्लैकमेल कर रहा हूँ।”
—
राघव ने बताया—
कॉलेज में वह नंदिता से प्यार करता था।
लेकिन नंदिता ने कभी उसे गंभीरता से नहीं लिया।
फिर नंदिता की शादी अभिषेक से हो गई।
राघव के अंदर बदले की आग जलने लगी।
उसने पुरानी तस्वीरों के सहारे नंदिता को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया।
—
होटल में हंगामा हो गया।
पुलिस आ गई।
इंस्पेक्टर सत्यनारायण ठाकुर ने जांच की।
राघव के मोबाइल से कई लड़कियों की तस्वीरें मिलीं।
वह एक पेशेवर ब्लैकमेलर निकला।
उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
—
लेकिन अभिषेक के दिल में एक दर्द रह गया।
“तुमने मुझसे सच क्यों छुपाया?”
नंदिता रोते हुए बोली—
“मुझे डर था कि तुम मुझे छोड़ दोगे।”
—
अभिषेक के पिता बोले—
“रिश्ते विश्वास पर चलते हैं।
लेकिन डर इंसान को गलत फैसला करा देता है।”
उन्होंने कहा—
“अगर इरादा गलत नहीं था… तो रिश्ता बच सकता है।”
—
नंदिता ने कहा—
“अगर तुम चाहो तो मैं चली जाऊँगी।”
अभिषेक ने कहा—
“नहीं… लेकिन अब हमारे बीच कोई राज नहीं होगा।”
नंदिता रोते हुए उसके गले लग गई।
—
कुछ महीनों बाद सब सामान्य हो गया।
परिवार पहले से ज्यादा मजबूत हो गया।
बच्चों की हँसी फिर घर में गूंजने लगी।
गाँव वाले कहते—
“मिश्रा परिवार सच में पारिवारिक बंधन का उदाहरण है।”
—
शाम का समय।
पूरा परिवार आँगन में बैठा है।
दादी बच्चों को कहानी सुना रही हैं।
अभिषेक नंदिता की तरफ देखता है।
नंदिता मुस्कुराती है।
अभिषेक कहता है—
“रिश्ते तब मजबूत होते हैं जब मुश्किल वक्त में भी साथ छोड़ा नहीं जाता।”
कैमरा धीरे-धीरे ऊपर उठता है।
मिथिला की शाम…
घर की रोशनी…
और एक खुशहाल परिवार।
—
प्यार सिर्फ खुशियों का नाम नहीं।
प्यार वह है जो संकट में भी साथ खड़ा रहे।
