#MNN24X7 (कथा प्रारम्भ)
शहर का नाम था शिवनगर।
शिवनगर से सटा एक सुनसान इलाका—नीलगिरी नहर का सूखा रजवाहा।
रात के ढाई बजे का वक्त।
कुत्तों के भौंकने की आवाज़ और नहर किनारे सरसराते सूखे पत्ते।
इसी रजवाहे में एक युवती की लाश पड़ी मिली थी।
गला कटा हुआ।
चेहरे पर डर की स्याही अब भी जमी थी।
जब पुलिस की जीप की लाल-नीली बत्तियाँ उस अंधेरे को चीरती हुई वहाँ पहुँचीं, तो सन्नाटा और गहरा हो गया।
थाना प्रभारी अर्जुन राणा ने टॉर्च की रोशनी में लाश को देखा—
“किसी ने बहुत करीब से वार किया है… ये कोई लूट या हादसा नहीं है… ये एक सोच-समझकर किया गया कत्ल है।”
पास ही एक युवक खून से लथपथ बैठा था।
आँखों में डर, चेहरे पर घाव।
उसने हकलाते हुए कहा—
“सर… बदमाश… चार लोग थे… उन्होंने हमारी कार रोक ली… मेरी पत्नी को… मार डाला…”
युवक का नाम था अदित्य मल्होत्रा—
शहर की नामी फाइनेंस कंपनी में ऑडिटर।
मृत युवती उसकी पत्नी काव्या थी—
जो महानगर नवपुर के एक प्राइवेट बैंक में नौकरी करती थी।
कहानी सीधी थी…
पर अर्जुन राणा को सीधी कहानियों पर कभी भरोसा नहीं होता था।
—
अदित्य और काव्या की शादी को सिर्फ पाँच महीने हुए थे।
वैलेंटाइन डे पर दोनों ने सोशल मीडिया पर मुस्कुराती तस्वीरें डाली थीं—
कॉफी मग, गुलाब, और एक कैप्शन—
“Forever Together ❤️”
लेकिन प्रेम की ये तस्वीरें सिर्फ कैमरे तक सीमित थीं।
असल जिंदगी में अदित्य का दिमाग शक की आग में जल रहा था।
काव्या रोज़ नवपुर जाती।
ऑफिस के बाद कभी-कभी देर हो जाती।
फोन पर सहकर्मियों से बात करती।
और बस… यही अदित्य को चुभता था।
वह हर कॉल पर पूछताछ करता—
“किससे बात कर रही थी?”
“इतनी देर क्यों लगी?”
“उस बैंक में कौन-कौन है?”
काव्या हँसकर टाल देती—
“तुम बेवजह सोचते हो, ये सब काम की बातें हैं।”
लेकिन शक का कीड़ा जब दिमाग में घुस जाए,
तो हँसी भी धोखा लगने लगती है।
—
15 फरवरी की रात।
शिवनगर से नवपुर की ओर जाती सुनसान सड़क।
चारों तरफ खेत और अंधेरा।
अदित्य कार चला रहा था।
काव्या खिड़की से बाहर देख रही थी।
अचानक अदित्य ने कार धीमी कर दी।
“थोड़ी देर रुकते हैं… मुझे सिगरेट पीनी है।”
कार नहर के पास रुकी।
सन्नाटा।
अगले ही पल—
अदित्य ने डैशबोर्ड से एक कैंची निकाली।
काव्या कुछ समझ पाती, उससे पहले—
कैंची उसके गले में धँस चुकी थी।
एक चीख…
और फिर सिर्फ खामोशी।
अदित्य के हाथ काँप रहे थे,
पर उसने दस्ताने पहने हुए थे।
उसने लाश को घसीटकर रजवाहे में फेंक दिया।
फिर खुद को हल्का-सा घायल किया।
शर्ट फाड़ी।
और सड़क पर चिल्लाने लगा—
“बचाओ! बदमाशों ने हमला कर दिया!”
—
डायल 112 की गाड़ी पहुँची।
अदित्य की कहानी सुनी गई।
लेकिन थाना प्रभारी अर्जुन राणा को कुछ अजीब लगा—
बदमाशों ने सिर्फ पत्नी को क्यों मारा?
जेवरात सुरक्षित क्यों थे?
कार लूटी क्यों नहीं गई?
आसपास संघर्ष के निशान क्यों नहीं थे?
सबसे बड़ी बात—
काव्या के गले पर जो घाव था,
वह किसी सड़कछाप हथियार से नहीं,
बल्कि किसी नुकीली घरेलू चीज से किया गया लग रहा था।
फॉरेंसिक टीम ने कार की तलाशी ली।
डिक्की के कोने में खून के छींटे।
सीट के नीचे से कैंची का कवर।
अर्जुन राणा ने अदित्य की आँखों में देखा—
वहाँ डर नहीं…
सिर्फ पकड़े जाने का खौफ था।
—
थाने में पूछताछ शुरू हुई।
पहले अदित्य रोया।
फिर चुप रहा।
फिर अचानक बोला—
“हाँ… मैंने ही मारा है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उसने बताया—
“मुझे शक था… वो ऑफिस वालों से बात करती थी…
मुझे लगता था वो मुझे धोखा दे रही है…
मैं उसे खो नहीं सकता था… इसलिए… मैंने उसे हमेशा के लिए… अपना बना लिया…”
ये कहते हुए उसकी आवाज़ काँप रही थी।
पर चेहरे पर पछतावे से ज़्यादा—
अपनी हार की झलक थी।
—
काव्या के परिवार वालों को जब सच्चाई पता चली,
तो माँ बेहोश हो गई।
पिता बस दीवार को घूरते रह गए।
“चार महीने में कभी झगड़े का अहसास नहीं हुआ…”
“वो तो बेटी की तरह हमारी देखभाल करता था…”
शिवनगर की गलियों में एक ही चर्चा थी—
“जो आदमी प्यार का दिखावा करता था, वही कातिल निकला।”
—
“सबसे खतरनाक अपराधी वो होता है
जो भरोसे के चेहरे के पीछे छिपा हो।
जिसके हाथों में गुलाब हो
और जेब में हथियार।”
—
अदित्य जेल की सलाखों के पीछे है।
काव्या की तस्वीर अब भी उसके मोबाइल में सेव है—
वैलेंटाइन डे वाली मुस्कान के साथ।
शिवनगर की उस सुनसान नहर के पास से गुजरते वक्त
लोग आज भी धीमी आवाज़ में कहते हैं—
“यहाँ प्यार नहीं… शक ने कत्ल किया था।”