#MNN24X7 (कथा प्रारम्भ)
मधुपुर विश्वविद्यालय का पुराना साहित्य भवन बरसात में कुछ ज़्यादा ही उदास लगता था। दीवारों से रिसता पानी, खिड़कियों पर जमी धूल, और बरामदे में टंगे पोस्टर—“युवा साहित्य शिविर: तीन दिन, तीन रात।” प्रोफेसर देवेश मिश्र उसी बरामदे से गुजरते हुए रुक गए। पोस्टर के नीचे कुछ छात्र खड़े थे। उनमें से एक लड़की अपनी कॉपी में कुछ लिख रही थी—बार-बार काटती, फिर लिखती। देवेश को लगा, यह वही बेचैनी है जो कविता लिखते समय चेहरे पर उतर आती है।
देवेश पचपन के पार थे। कॉलेज में उनकी पहचान तेज़ भाषण और कोमल व्यंग्य के लिए थी। घर में पत्नी और दो बच्चे—एक इंजीनियरिंग की तैयारी में, दूसरा बारहवीं में। जीवन व्यवस्थित था, पर भीतर कहीं सूखापन जमा था। रोज़ वही क्लास, वही पाठ्यक्रम, वही घर का शोर। उन्होंने उस लड़की की कॉपी की ओर इशारा किया, “कविता?”
लड़की चौंकी—“जी, सर। नाम रुचिका है।”
“शिविर में पढ़ना चाहोगी?”
रुचिका की आँखों में चमक आ गई।
शिविर के पहले दिन रुचिका ने अपनी कविता पढ़ी। शब्द कच्चे थे, पर भाव सच्चा। देवेश ने मंच से उतरकर उसके पास बैठते हुए कहा, “तुम्हारे शब्दों में घर की जिम्मेदारियों का बोझ है।” किसी ने पहली बार उसके भीतर की थकान पहचान ली थी। उसी पल रुचिका को लगा—यह आदमी उसे समझता है। और देवेश को लगा—किसी ने उसकी बात को ज़रूरी समझा है।
तीन दिन में बातचीत दोस्ती में बदली। दोस्ती कब सहारे में बदल गई—पता ही नहीं चला। रुचिका की माँ बीमार रहती थी; पिता के जाने के बाद घर का बोझ उसी पर था। देवेश उसे किताबें देते, प्रतियोगिताओं के फॉर्म भरवाते। वह उन्हें अपने डर बताती—“सर, मैं साधारण हूँ, मुझे कोई नहीं सुनता।”
देवेश कहते—“साधारण होना बुरा नहीं, बस खुद को कम मत समझो।”
धीरे-धीरे “सर” शब्द हल्का होने लगा।
कॉलेज की गलियारों में फुसफुसाहटें शुरू हुईं। किसी ने कहा—“गुरु-शिष्या में दोस्ती?” किसी ने हँसकर उड़ाया—“आजकल सब चलता है।” देवेश ने खुद से कहा—यह दोस्ती है, इसमें बुराई क्या? पर भीतर कहीं एक रेखा धुंधली हो चुकी थी। रुचिका के लिए देवेश सुरक्षा का अहसास थे; देवेश के लिए रुचिका नई ऊर्जा।
एक शाम बरामदे में बारिश रुकने का इंतज़ार करते हुए रुचिका ने कहा, “सर, क्या किसी को उम्र के हिसाब से ही प्यार करना चाहिए?”
देवेश ने हँसकर टाल दिया। पर सवाल हवा में रह गया। उस रात देवेश घर लौटे तो पत्नी ने पूछा—“आज देर कैसे हो गई?”
“कॉलेज में काम था,” उन्होंने कहा। सच आधा था।
कुछ महीनों बाद मामला खुल गया। किसी छात्र ने शिकायत कर दी। देवेश को प्राचार्य के कमरे में बुलाया गया। पूछताछ हुई। “आपको पता है, यह संबंध नैतिक रूप से गलत है?”
देवेश चुप रहे।
रुचिका को घर से धमकियाँ मिलने लगीं—“तूने बदनामी कर दी।”
मीडिया ने खबर उछाली—“कैंपस रोमांस।” कैमरे मुस्कान ढूँढते हैं; आँसू नहीं।
दबाव बढ़ा। देवेश निलंबित हुए। घर में तूफ़ान आया। पत्नी ने रोते हुए कहा—“हमारी गलती क्या थी?” बच्चे दीवार की ओर देख रहे थे। देवेश को पहली बार समझ आया—उनका फैसला सिर्फ उनका नहीं था। रुचिका को भी समझ आया—उसकी कहानी अब उसकी नहीं रही; हर कोई उस पर अपनी राय चिपका रहा है।
दोनों ने साथ रहने का फैसला किया। छोटे से कमरे में दो लोग और बहुत सारे सपने। शुरुआत में सब नया था—सुबह की चाय, किताबों के बीच बातचीत, देर रात कविताएँ। पर धीरे-धीरे वास्तविकता ने दरवाज़ा खटखटाया। पैसे कम पड़ने लगे। नौकरी की तलाश कठिन थी। समाज का तिरस्कार पीछा करता रहा। रुचिका ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी छोड़ी—“अभी हालात ठीक नहीं हैं।” देवेश ने कहा—“थोड़ा समय दे दो।” समय खिसकता गया।
रुचिका के भीतर खालीपन भरने लगा। उसे अपनी उम्र के दोस्त याद आते—उनकी हँसी, उनके छोटे-छोटे सपने। वह कभी-कभी खिड़की से बाहर देखती और सोचती—“मैं किस कहानी में फँस गई?”
देवेश भी बदल गए थे। चिंता ने उनके शब्दों की धार कुंद कर दी थी। वे अक्सर कहते—“दुनिया समझे या न समझे, हमारा प्यार सच्चा है।” पर सच्चाई की कसौटी रोज़मर्रा की थकान में फिसलने लगी।
एक दिन रुचिका ने कहा—“मैं कुछ समय के लिए अपने लिए जीना चाहती हूँ।”
देवेश चौंके—“हम साथ जी रहे हैं न?”
“साथ रहना और अपने लिए जीना अलग-अलग होता है,” उसने धीरे से कहा।
वह आध्यात्म की ओर मुड़ी—कभी ध्यान शिविर, कभी शहर बदलना। उसे लगा—वहाँ उसे अपनी आवाज़ फिर मिल जाएगी। देवेश ने रोका, मनाया, पर रुचिका की आँखों में अब ठहराव नहीं था।
रुचिका चली गई—बिना शोर, बिना इल्ज़ाम।
देवेश लौटकर गाँव आए। एक छोटा स्कूल खोला। बच्चों को पढ़ाते समय कभी-कभी उनकी आवाज़ में वही पुरानी चमक लौट आती है। शाम को वे बरामदे में बैठकर सोचते हैं—“काश, मैंने उस दिन गुरु की रेखा न लांघी होती।” घर की तस्वीरें अब भी जेब में रहती हैं। वे किसी को दोष नहीं देते—बस जिम्मेदारी को देर से पहचानने का दुख है।
रुचिका दूर कहीं अपनी राह खोज रही है। शायद वह फिर पढ़ेगी, शायद लिखेगी, शायद अपने जैसे किसी और को सुनेगी—जैसे कभी किसी ने उसे सुना था।
कैंपस अब भी खड़ा है—पोस्टर बदल गए हैं, पर दीवारें वही हैं। दीवारें सब देखती हैं; शोर नहीं करतीं। शोर इंसान करता है—और खामोशी में अपनी गलतियों से सीखता है।
क्योंकि प्रेम अगर बराबरी का न हो, तो वह सहारा कम और बोझ ज़्यादा बन जाता है।
कहानी का सामाजिक संदेश
यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं, एक पूरे पैटर्न की कहानी है।
पावर डायनामिक्स खतरनाक होते हैं
गुरु-शिष्य, टीचर-स्टूडेंट जैसे रिश्तों में बराबरी नहीं होती। वहाँ “प्यार” कई बार भ्रम बन जाता है।
उम्र और अनुभव का फर्क फैसलों को असंतुलित कर देता है
युवा भावनाओं में फैसले करता है,
बड़ा व्यक्ति जिम्मेदारी में चूक करता है।
मीडिया की “लव स्टोरी” असल ज़िंदगी की त्रासदी छुपा देती है
कैमरे रोमांस दिखाते हैं,
पीछे टूटे परिवार और टूटे मन नहीं।
दोनों की जिम्मेदारी होती है
गलती सिर्फ एक की नहीं होती—
लेकिन ताकतवर को ज़्यादा ज़िम्मेदार होना चाहिए।