#MNN24X7 कथा प्रारम्भ
शिवगढ़ की वह रात रोशनी से जगमगा रही थी। मंडप में सजे फूलों की खुशबू हवा में तैर रही थी। ढोल की थाप पर नाचते लोग, कैमरों की चमक और चेहरों पर मुस्कान—सब कुछ वैसा ही था जैसा हर माँ-बाप अपने बच्चे की शादी में देखना चाहता है।

अनुजा की माँ बार-बार अपनी बेटी को निहार रही थी। आँखों में खुशी भी थी और विदाई का डर भी। पिता दूर खड़े मेहमानों से मिलते हुए सोच रहे थे—
“बेटी की ज़िंदगी आज से नए घर की हो जाएगी… ईश्वर इसे खुश रखे।”

फेरे पूरे हो चुके थे। मंत्रोच्चार के बीच दो अनजान ज़िंदगियाँ एक-दूसरे का हाथ थाम चुकी थीं। सबको लगा था कि अब बस विदाई की रस्म बाकी है…
पर किसी को क्या पता था कि एक छोटी-सी रस्म दो परिवारों के सपनों को चकनाचूर कर देगी।

हँसी-ठिठोली के लिए मशहूर जूता-छुपाई शुरू हुई। अनुजा की बहनों ने मुस्कुराते हुए दूल्हे के जूते छुपाए और मज़ाक में कहा—
“11,000 मिलेंगे तभी जूते मिलेंगे।”

दूल्हा पक्ष ने भी हल्के अंदाज़ में जवाब दिया—
“5,100 रस्म के लिए काफी हैं।”

यहीं पर मज़ाक ने अपना रंग बदल लिया। शब्दों में तंज घुल गया। मुस्कानें सिकुड़ने लगीं। किसी ने यह नहीं सोचा कि सामने खड़ी लड़की की ज़िंदगी की सबसे नाज़ुक घड़ी है। किसी ने यह नहीं सोचा कि यह रस्म प्यार की है, व्यापार की नहीं।

कुछ ही पलों में आवाज़ें ऊँची हो गईं। दूल्हे ने गुस्से में ऐसी माँग रख दी जिसने पूरे रिश्ते की नींव हिला दी।

दूल्हे का धैर्य जवाब दे गया। अहंकार ने संस्कारों को पीछे छोड़ दिया। उसने पलटकर ऐसी काउंटर-डिमांड रख दी जिसने रिश्ते की जड़ हिला दी—
5 लाख रुपये नकद और एक बुलेट बाइक।
अब बात जूतों की नहीं रही। यह दहेज, प्रतिष्ठा और पुरुष अहंकार की लड़ाई बन गई। शब्द तेज़ हुए, स्वर ऊँचे हुए, और रिश्ते का पुल टूट गया। दुल्हन अनुजा जाखड़ ने स्वयं पुलिस को बुलाया और दूल्हे के खिलाफ FIR दर्ज कराई। जवाब में दूल्हे के पिता ने भी आरोप लगाते हुए क्रॉस-FIR करवाई कि उनके बेटे को बंधक बनाया गया।
दोनों परिवारों ने मिलकर इस विवाह पर करीब 40–50 लाख रुपये खर्च किए थे। लेकिन एक रस्म में छुपा अहंकार, वर्षों के सपनों पर भारी पड़ गया। रिश्तेदारों और समाज के बुज़ुर्गों ने बहुत समझाया, लेकिन जब ईगो संवाद पर हावी हो जाए, तो समझाइश बेअसर हो जाती है।

अब बात जूतों की नहीं थी,
अब बात अहंकार और दहेज की थी।

अनुजा चुपचाप सब देख रही थी। वह लड़की, जिसने सपनों में अपने नए जीवन का घर सजाया था, उस पल खुद को बोझ समझने लगी। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वह रोई नहीं—क्योंकि समाज ने उसे सिखाया था कि दुल्हन को चुप रहना चाहिए।

जब बात हद से आगे बढ़ी, तो उसने पुलिस को बुलाया।
यह सिर्फ़ एक शिकायत नहीं थी—
यह उस लड़की की टूटी हुई उम्मीदों की आवाज़ थी।

दोनों परिवारों ने शादी पर लाखों खर्च किए थे, मगर किसी ने यह नहीं समझा कि रिश्ते पैसों से नहीं बनते। रिश्ते बनते हैं संवेदनशीलता, सम्मान और समझदारी से।

बुज़ुर्गों ने बहुत समझाया—
“बच्चो, रस्में दिल जोड़ने के लिए होती हैं।”
लेकिन जब अहंकार कानों पर हाथ रख ले, तो समझाइश आवाज़ बनकर हवा में खो जाती है।

अंत में वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था।
दो ज़िंदगियाँ, जिन्हें एक-दूसरे का सहारा बनना था,
एक ज़िद की वजह से अलग हो गईं।

समाज से सवाल

हम रस्में निभाते हैं या रस्मों के पीछे छुपा अपना अहंकार?
क्या बेटी की विदाई खुशी का मौका है या लेन-देन की रस्म?
क्या हँसी-मज़ाक रिश्ते को मजबूत करता है,
या हमारा लालच उसे तोड़ देता है?

अगर परंपराएँ इंसानियत से बड़ी हो जाएँ,
तो समझ लीजिए—
परंपरा नहीं बची,
संवेदना मर गई।

सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि जूता छुपाई जैसी रस्में रिश्तों में मिठास घोलने के लिए होती हैं, न कि व्यापार और ताकत दिखाने के लिए। जब परंपराएँ भावनाओं से कटकर सौदेबाज़ी बन जाएँ, तो विवाह एक संस्कार नहीं, लेन-देन का मंच बन जाता है।
शिवगढ़ की यह घटना एक चेतावनी है—
अगर रस्में अहंकार से निभेंगी,
तो रिश्ते निभ ही नहीं पाएँगे।