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“हर तूफ़ान शोर मचाकर नहीं आता। कुछ तूफ़ान पहले सन्नाटा लाते हैं, फिर पूरी ज़िंदगी उजाड़ देते हैं।”

दिसंबर की ठंड अपने चरम पर थी।

कमलपुर गाँव हर साल की तरह धुंध की सफेद चादर में लिपटा हुआ था। सुबह देर तक सूरज का चेहरा दिखाई नहीं देता था। खेतों में खड़ी सरसों की फसल पर ओस की बूंदें मोतियों की तरह चमकती थीं।

उस दिन भी सुबह सामान्य थी।

निरंजन ने पिता के साथ खेत में गेहूँ की सिंचाई की। दोपहर में वह कस्बे की लाइब्रेरी गया, जहाँ उसने प्रतियोगी परीक्षा की एक पुरानी किताब लौटाई। लौटते समय उसने डाकघर से एक आवेदन पत्र खरीदा। अगले महीने एक सरकारी विभाग में भर्ती निकलने वाली थी।

घर लौटकर उसने माँ से हँसते हुए कहा—

“माय, इस बार नौकरी जरूर मिलेगी।”

सीता देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

“भगवान तोहर मुँह में घी-शक्कर दे बेटा।”

उन्हें क्या मालूम था कि भाग्य ने उनके बेटे के लिए कुछ और ही लिख रखा है।

उसी रात…

शहर में वार्षिक व्यापार मेला लगा था।

चारों ओर चहल-पहल थी।

दुकानों पर भीड़ उमड़ रही थी।

बस अड्डे से लेकर बाजार तक लोगों का आना-जाना लगा हुआ था।

रात लगभग नौ बजे शहर की एक लोकल बस में कुछ युवक चढ़े।

बस यात्रियों से भरी हुई थी।

कुछ देर बाद सीट को लेकर कहासुनी शुरू हुई।

पहले ऊँची आवाज़ें उठीं।

फिर धक्का-मुक्की।

कुछ यात्रियों ने बीच-बचाव की कोशिश की।

लेकिन गुस्सा अब नियंत्रण से बाहर निकल चुका था।

अचानक किसी ने जेब से चाकू निकाल लिया।

एक वार…

फिर दूसरा…

बस में अफरा-तफरी मच गई।

महिलाएँ चीखने लगीं।

बच्चे रोने लगे।

ड्राइवर ने बस सड़क किनारे रोक दी।

कुछ लोग भाग निकले।

कुछ घायल युवक को अस्पताल ले जाने लगे।

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

रास्ते में ही उसकी साँसें थम गईं।

एक मामूली झगड़ा…

एक हत्या में बदल चुका था।

अगली सुबह

शहर के अखबारों की पहली खबर यही थी—

“बस में युवक की हत्या, हमलावर फरार।”

चाय की दुकानों पर उसी की चर्चा थी।

किसी ने कहा—

“लुटेरे रहे होंगे।”

दूसरे ने कहा—

“नहीं, पुरानी दुश्मनी का मामला है।”

तीसरा बोला—

“सुना है, पाँच-छह लड़के थे।”

सच क्या था…

यह किसी को नहीं मालूम था।

लेकिन अफवाहें सच से तेज़ दौड़ रही थीं।

पुलिस की शुरुआत

शहर कोतवाली में मामला दर्ज हुआ।

निरीक्षक देवकीनंदन सिंह को जाँच की जिम्मेदारी मिली।

उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया।

बस को थाने लाया गया।

खून के धब्बे अब भी सीटों पर जमे हुए थे।

यात्रियों के बयान दर्ज होने लगे।

लेकिन हर बयान अलग था।

एक ने कहा—

“चार लड़के थे।”

दूसरे ने कहा—

“नहीं, पाँच थे।”

किसी ने कहा—

“मुख्य आरोपी नीली कमीज़ पहने था।”

दूसरे ने कहा—

“सफेद कुर्ता था।”

घटना जितनी भयावह थी,

उतनी ही उलझी हुई भी।

कमलपुर में…

गाँव वालों को शहर की घटना की खबर मिल गई थी।

चौपाल पर चर्चा हो रही थी।

रघुवीर बोला—

“आजकल लोग छोटी-सी बात पर जान ले लेते हैं।”

निरंजन ने गंभीर स्वर में कहा—

“जिस समाज में गुस्सा कानून से बड़ा हो जाए, वहाँ सबसे पहले इंसानियत मरती है।”

जगदीश झा बेटे की बात सुनकर मुस्कुराए।

उन्हें अपने बेटे पर गर्व था।

दो दिन बाद

पुलिस ने कुछ संदिग्ध युवकों को हिरासत में लिया।

पूछताछ शुरू हुई।

घंटों तक सवाल पूछे गए।

लेकिन कोई ठोस सुराग नहीं मिला।

उधर अखबारों और लोगों का दबाव बढ़ने लगा।

“हत्यारे कब पकड़े जाएँगे?”

“पुलिस क्या कर रही है?”

हर दिन यही सवाल उठ रहे थे।

जाँच तेज़ कर दी गई।

एक नाम…

तीसरे दिन शाम को पुलिस को एक गुमनाम सूचना मिली।

सूचना देने वाले ने कुछ नाम बताए।

उनमें एक नाम था—

निरंजन झा।

निरीक्षक देवकीनंदन सिंह ने फाइल में वह नाम दर्ज कर लिया।

उन्होंने पूछा—

“यह कौन है?”

एक सिपाही बोला—

“सर, कमलपुर गाँव का रहने वाला है।”

“अपराध का कोई रिकॉर्ड?”

“नहीं सर।”

“फिर नाम कैसे आया?”

सिपाही चुप रहा।

गुमनाम सूचना का कोई आधार नहीं था।

लेकिन दबाव में चल रही जाँच में हर नाम की जाँच आवश्यक समझी गई।

उसी समय…

निरंजन अपने घर में बैठा प्रतियोगी परीक्षा का आवेदन भर रहा था।

माँ रसोई में रोटियाँ सेंक रही थीं।

पिता लालटेन की रोशनी में अखबार पढ़ रहे थे।

आँगन में तुलसी का दीपक जल रहा था।

घर के भीतर भविष्य की योजनाएँ बन रही थीं।

और शहर के एक थाने में…

उसी समय…

एक पुलिस फाइल पर पहली बार लिखा जा चुका था—

“संदिग्ध – निरंजन झा।”

निरंजन को इसकी कोई खबर नहीं थी।

वह निश्चिंत होकर सो गया।

लेकिन किस्मत जाग चुकी थी।

आधी रात

ठंडी हवा तेज़ हो गई थी।

दूर कहीं कुत्ते लगातार भौंक रहे थे।

सीता देवी की नींद अचानक खुली।

उन्होंने बाहर झाँका।

गाँव की पगडंडी पर कुछ लालटेनें हिलती हुई दिखाई दीं।

साथ में बूटों की आवाज़…

धीरे-धीरे…

और करीब आती हुई।

जगदीश झा भी उठ बैठे।

उन्होंने दरवाज़े की ओर देखा।

बाहर किसी ने ज़ोर से दस्तक दी।

ठक… ठक… ठक…

“दरवाज़ा खोलिए!”

आवाज़ सख्त थी।

जगदीश झा ने दरवाज़ा खोला।

सामने पुलिस खड़ी थी।

निरंजन अभी तक गहरी नींद में था।

उसे नहीं मालूम था…

कि यह दस्तक केवल उसके घर के दरवाज़े पर नहीं,

उसकी पूरी ज़िंदगी पर पड़ी थी।

अध्याय–2 समाप्त

अगले अध्याय में आप पढेंगे – जब “पहला आरोप” में पहली बार निरंजन का सामना पुलिस से होगा। तब क्या एक साधारण युवक अचानक हत्या के मुकदमे में घिर जाएगा? क्या उसके माता-पिता, गाँव और पूरे परिवार की दुनिया एक ही रात में बदल जाएगी? क्या यहीं से “कानून का कैदी” की असली त्रासदी शुरू होगी? सब जानेंगे अगले चैप्टर में।