#MNN24X7 कथा प्रारम्भ
यह कहानी मिथिला की पवित्र धरती —जहाँ रिश्तों को निभाना संस्कार होता है, और बेटी को विदा करना कुछ पिता के लिए सबसे बड़ा बोझ।
—
मधुबनी जिले के एक छोटे से गाँव खजुरी में सुबह की हल्की धूप खेतों पर फैल रही थी। सरसों के पीले फूल हवा के साथ झूम रहे थे, और दूर मंदिर से आती घंटियों की आवाज़ वातावरण को शांत बना रही थी। इस गाँव में हर घर में एक कहानी थी—किसी के संघर्ष की, किसी के सपनों की, और किसी के दर्द की।
उसी गाँव में रहता था राघव झा—एक ऐसा आदमी, जिसे लोग बाहर से “डॉक्टर बाबू” कहते थे, लेकिन अंदर ही अंदर बहुत लोग जानते थे कि वो असली डॉक्टर नहीं, बल्कि एक झोलाछाप था। गाँव-गाँव घूमकर दवा देना, इंजेक्शन लगाना, छोटी-मोटी बीमारी का इलाज करना—यही उसका काम था।
उसकी उम्र करीब 35 साल थी, चेहरा सामान्य, लेकिन आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी और गुस्सा हमेशा झलकता था। लोग उससे डरते भी थे, और जरूरत पड़ने पर उसके पास जाते भी थे।
लेकिन उसकी जिंदगी का असली सच कुछ और ही था—एक ऐसा सच, जिसे उसने बहुत चालाकी से समाज से छुपा रखा था।
साल 2014 के अंत में, राघव झा की पहली शादी हुई थी। लड़की का नाम था सविता—दरभंगा के एक गरीब लेकिन सम्मानित परिवार की बेटी। सविता सीधी-सादी, संस्कारी और बहुत सहनशील थी। शादी पूरे रीति-रिवाज से हुई थी, ढोल-नगाड़ों के साथ बारात आई थी, और पिता ने अपनी हैसियत से बढ़कर दहेज दिया था।
शादी के बाद शुरुआती कुछ दिन सब ठीक रहा। लेकिन धीरे-धीरे राघव का असली स्वभाव सामने आने लगा। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करना, मारपीट करना, ताने देना—ये सब उसकी आदत बन गई। सविता सब कुछ सहती रही, क्योंकि उसे बचपन से यही सिखाया गया था कि “ससुराल ही असली घर होता है।”
लेकिन शादी के सिर्फ छह महीने बाद, एक रात खबर आई—
“सविता जल गई…”
गाँव में हड़कंप मच गया। राघव ने कहा—
“चूल्हा फट गया था… दुर्घटना हो गई…”
लोगों ने कुछ सवाल किए, लेकिन कोई ठोस सबूत नहीं था। मामला धीरे-धीरे शांत हो गया। सविता की चिता की राख ठंडी भी नहीं हुई थी कि समाज ने इसे “किस्मत” कहकर भुला दिया।
दो साल बाद, 2017 में राघव ने दूसरी शादी की। इस बार लड़की थी नीलम—समस्तीपुर की रहने वाली। उसके परिवार को बताया गया कि लड़का “कुंवारा” है, और बहुत अच्छा कमाता है।
नीलम के माता-पिता ने भरोसा किया, बेटी को विदा किया।
शुरुआत में सब ठीक रहा, लेकिन कुछ ही महीनों में वही कहानी दोहराई जाने लगी। नीलम भी मानसिक और शारीरिक अत्याचार का शिकार होने लगी।
एक दिन, शादी के सात महीने बाद खबर आई—
“नीलम छत से गिर गई…”
राघव ने कहा—
“पैर फिसल गया था…”
लेकिन इस बार गाँव में कुछ लोगों को शक हुआ। फिर भी, बिना सबूत के कोई कुछ नहीं कर पाया।
समय बीतता गया…
और 2019 में राघव ने तीसरी शादी कर ली।
इस बार लड़की थी पूजा कुमारी—सीतामढ़ी की रहने वाली, पढ़ी-लिखी और थोड़ी समझदार।
शादी के बाद जब उसे धीरे-धीरे राघव के अतीत का पता चला, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
पूजा ने विरोध करना शुरू किया।
उसने कहा—
“ये सब क्या है? तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला?”
राघव का गुस्सा और बढ़ गया।
अब अत्याचार और भी ज्यादा होने लगा।
लेकिन पूजा सविता और नीलम की तरह चुप नहीं रही।
एक दिन, वो मौका देखकर घर से भाग गई।
वो कभी वापस नहीं आई।
गाँव में लोग धीरे-धीरे बातें करने लगे—
“कुछ तो गड़बड़ है…”
“तीन-तीन शादियाँ… और तीनों का ऐसा हाल…”
लेकिन फिर भी कोई खुलकर सामने नहीं आया।
और फिर…
साल 2023 में, राघव ने चौथी शादी की।
इस बार लड़की थी काजल मिश्रा—मधुबनी की रहने वाली, एक सम्मानित परिवार की बेटी। काजल पढ़ी-लिखी, संस्कारी और बेहद शांत स्वभाव की थी।
राघव ने इस बार भी वही झूठ बोला—
“मैं कुंवारा हूँ…”
काजल के परिवार ने भरोसा किया।
धूमधाम से शादी हुई।
बेटी को हँसते-खेलते विदा किया गया।
लेकिन कुछ ही दिनों में काजल को सच्चाई का अंदाजा होने लगा।
एक दिन उसने अपनी माँ को फोन किया—
“माँ… यहाँ सब कुछ ठीक नहीं है…”
माँ ने पूछा—
“क्या हुआ बेटा?”
काजल रोते हुए बोली—
“माँ… ये आदमी बहुत गुस्सैल है… मुझे मारता है… और कुछ छुपा रहा है…”
धीरे-धीरे काजल को सारी सच्चाई पता चल गई—
पहली तीन शादियों का सच।
उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसने माँ से कहा—
“माँ… मैं यहाँ नहीं रहना चाहती…”
लेकिन फिर खुद ही बोली—
“लेकिन मैं कोशिश करूँगी… रिश्ता निभाने की…”
क्योंकि वो संस्कारों में बंधी थी।
उसे सिखाया गया था—
“शादी एक बार होती है… निभानी पड़ती है…”
लेकिन राघव का व्यवहार दिन-ब-दिन खतरनाक होता जा रहा था।
वो छोटी-छोटी बातों पर चिल्लाता, मारता, मानसिक रूप से तोड़ता।
काजल अंदर से टूट रही थी…
लेकिन बाहर से चुप थी।
एक दिन…
अचानक खबर आई—
“काजल नहीं रही…”
पूरा गाँव सन्न रह गया।
राघव ने फिर वही कहा—
“उसने खुद… ये कदम उठा लिया…”
लेकिन इस बार बात इतनी आसानी से दबने वाली नहीं थी।
काजल के परिवार वाले पहुंचे।
माँ चीख-चीख कर रो रही थी—
“मेरी बेटी ऐसा नहीं कर सकती…
वो इतनी कमजोर नहीं थी…”
पिता गुस्से में थे—
“हमसे झूठ बोलकर शादी की…
हमारी बेटी को मार डाला…”
अब गाँव के लोग भी खुलकर सामने आने लगे।
किसी ने कहा—
“पहली भी ऐसे ही मरी थी…”
“दूसरी भी…”
“तीसरी भाग गई थी…”
सारे राज धीरे-धीरे खुलने लगे।
पुलिस आई…
जांच शुरू हुई…
और राघव झा, जो खुद को “डॉक्टर” कहता था,
अब एक आरोपी बन चुका था।
गाँव में चर्चा थी—
“कितनी बेटियों की जिंदगी बर्बाद की इस आदमी ने…”
काजल की माँ हर दिन एक ही बात दोहराती—
“अगर हमें पहले पता होता…
तो हम अपनी बेटी को कभी नहीं भेजते…”
यह कहानी सिर्फ एक आदमी की नहीं…
यह कहानी उस समाज की भी है
जो बिना जांचे-परखे रिश्ते तय कर देता है।
यह कहानी उन बेटियों की है
जो संस्कार के नाम पर सब कुछ सहती रहती हैं…
और कई बार… अपनी जिंदगी तक खो देती हैं।
मिथिला की इस पवित्र धरती पर आज भी लोग कहते हैं—
“बेटी को विदा करने से पहले…
सिर्फ घर नहीं… लड़के का सच भी देखना जरूरी है…”
क्योंकि—
एक गलत फैसला…
पूरी जिंदगी छीन सकता है।

आशुतोष कुमार झा
