#MNN24X7 कथा प्रारंभ

पेठाघाट की सुबह वैसी ही शांत थी जैसे किसी किसान की थकी हथेली पर टिकी आशा की अंतिम बूंद। पूर्व दिशा से उठता सूरज अपने हल्के लाल रंग से कस्बे की ईंटों को ऐसे छूता मानो बरसों पुराने दुखों को दिलासा दे रहा हो।

पेठाघाट—यह नाम सुनते ही मन में कच्चे रास्ते, पगडंडियों पर दौड़ते बच्चे, तालाब किनारे खड़ी बकरियाँ और खेतों के बीच हवा में झूमती सरसों की महक जैसे स्वयं जीवंत हो उठती है।

इसी मिट्टी का बेटा था आशू मिश्रा—दुबला-पतला, तेज निगाहों वाला, पर मन से उतना ही कोमल जितना कोई किसान अपनी पहली फसल के साथ होता है।

उसके पिता आखिलेंद्र मिश्रा, कस्बे में अनुशासनप्रिय व्यक्ति माने जाते थे। उनकी वाणी तलवार सी तीखी और सिद्धांत पहाड़ जैसे अडिग। लेकिन माँ शांति देवी—उनके लिए संसार का सबसे सुंदर वाक्य बस इतना था—
“बेटा खाना खा ले।”

—बालमन और संघर्ष की आग

घर में साधन भले कम थे, पर इच्छाएँ ऐसी जैसे आकाश अपनी पूरी चौड़ाई फैलाकर उसे बुला रहा हो। जब साथी बच्चे गली में गिल्ली-डंडा खेलते,

आशू कभी शिकंजी बेचकर देखता, तो कभी गाँव की चौपाल में बनाई हुई मिट्टी की छोटी-छोटी मूर्तियाँ।कई लोग हँसते—“अरे, डॉक्टर-इंजीनियर बनने की उम्र में लड्डू बेच रहा है!” लेकिन वह बिना कुछ कहे बस मुस्कुरा देता। उसकी मुस्कान में एक अग्नि थी—जैसे किसी दीपक में दोहरी लौ जल रही हो।

—गौसा नदी — पहली मुलाक़ात का मौन साक्षी

पेठाघाट से कुछ दूरी पर बहती गौसा नदी का स्वभाव भी आशू जैसा ही था—सादा, शांत, पर भीतर कहीं गहरा।

इसी नदी के किनारे एक दोपहर उसे रजनी मिली।रजनी—नज़रें झुकी हुई, हाथ में डायरी, और चेहरे पर हल्की थकान लेकिन मन में पहाड़ों सा साहस। वह अपने सपनों पर कुछ लिख रही थी।

आशू ने अनायास पूछा—
“क्या लिख रही हो?”
रजनी ने मुस्कुराकर कहा—
“सपने… बस, कभी पूरे हों तो अच्छा।”

उस एक वाक्य में आशू को अपना भविष्य दिख गया।
धीरे-धीरे दोनों की बातचीत ने दोस्ती का रूप लिया।
गौसा नदी का हर मोड़, हर किनारा मानो उनके प्रेम का विश्वस्त साक्षी बन चुका था।

—पिता की शर्त — सपनों से बड़ा दायित्व

जब पढ़ाई खत्म होकर विवाह की बात चली, पिता ने कठोर आवाज़ में कहा—
“एमबीबीएस किए बिना शादी की बात मत करना। आदमी वही है जो मेहनत कर अपने पैरों पर खड़ा हो।”

यह शर्त आशू के व्यापारिक सपनों पर पत्थर जैसी गिरी।
पर रजनी की आँखों के विश्वास ने उसे संबल दिया।
वह खुद से बोला—
“मेरा प्रेम मेरी कमजोरी नहीं, मेरी शक्ति बनेगा।”

—साधारण युवा की असाधारण यात्रा

प्रतापनगर की चकाचौंध में आशू को लगा वह किसी भट्टी में झोंक दिया गया हो।
दोपहर की धूप से तपे हॉस्टल में पंखे की धीमी आवाज़,
रातभर जागकर किताबों में झुकना,
कभी मरीजों की चीख, कभी रिश्तेदारों का रोना…

यह सब मिलकर जैसे मन को थकाने का हर दिन नया उपाय खोजते थे।
पर रजनी की लिखी डायरी के कुछ वाक्य वह हमेशा साथ रखता—

“जब तक तुम हो, मेरे सपनों का रास्ता अंधेरा नहीं।”

छह वर्ष बीते…
और उनकी मेहनत ने उन्हें एमबीबीएस की डिग्री दिलाई—
एक कागज़ नहीं, बल्कि मानो चरित्र का प्रमाणपत्र।

—विवाह — सुख का उजला पर्व

पेठाघाट में आशू और रजनी का विवाह हुआ।
ढोल, शहनाई, रंग-बिरंगी झालरों से सजा गाँव—
हर कोई मानो अपनी खुशी दाँव पर लगा रहा था।

शादी के बाद दोनों का जीवन शांत सरोवर जैसा था—
शाम की चाय, खेतों की पगडंडियों पर लंबी सैरें, और भविष्य के सपनों में खिलखिलाहट।

तभी रजनी ने कहा—
“आशू… मेरा मन कह रहा है कोई नया मेहमान आने वाला है।”

आशू जैसे आसमान पर उड़ गया।
पर नियति के पन्नों पर कुछ और लिखा था।

—त्रासदी — एक हँसी का चुप हो जाना

डिलीवरी वाली रात कस्बे के ऊपर काली घटाएँ छायी हुई थीं।
दर्द में कराहती रजनी की आवाज़, डॉक्टरों की भागदौड़, और अचानक गहरा सन्नाटा…

कुछ घंटों में ही आशू की दुनिया खंडहर हो गई।

बच्चा जीवित न रहा
और रजनी…
रजनी भी चली गई।

उनकी चूड़ियों की आवाज़ का न रह जाना ही उनके जीवन की सबसे बड़ी कमी बन गया।

—समर्पण — रजनी की रोशनी में समाज सेवा

रजनी की याद ने आशू को टूटने नहीं दिया।
उसने खुद से कहा—
“जिसे मैं सबसे ज्यादा प्यार करता था, उसकी स्मृति को दुख नहीं, सेवा चाहिए।”

वह गाँव-गाँव जाने लगा।
किसी बुजुर्ग का आर्थ्राइटिस ठीक करता,
किसी बच्चे का बुखार,
किसी माँ को सुरक्षित प्रसव की जानकारी देता।

गाँव वाले कहते—
“रजनी बहू की याद में डॉक्टर बाबू भगवान का रूप हो गए हैं।”

— महामारी — मानवता की असली परीक्षा

जब कोरोना ने पूरे प्रतापनगर के गाँवों में भय फैला दिया,
लोग घरों में कैद हो गए,
कच्चे रास्ते दलदली हो गए,
अफवाहों ने लोगों की हिम्मत छीन ली—

ऐसे समय में आशू एक लालटेन की तरह अंधेरे में चमके।

वह टीम के साथ गाँव पहुँचे।
दिन रात मरीजों को संभाला।
कई बार खुद बुखार में तपते हुए भी दवाइयाँ बाँटते रहे।
नींद कई दिनों तक दुश्मन बनी रही।

गाँव वालों ने आख़िर कहा—

“डॉक्टर बाबू, आपसे हमने जाना कि सेवा कैसी होती है। आपने रजनी बहू का नाम ऊँचा कर दिया।”

— प्यार जो सेवा बनकर जीवित रहता है

समय के साथ पेठाघाट बहुत बदला,पर आशू की कहानी आज भी हर चौपाल में सुनाई देती है।

उन्होंने प्यार के लिए अपना रास्ता बदला, और वही प्यार समाज के लिए एक नई राह बन गया।

रजनी भले चली गई हो, लेकिन उसकी मुस्कान आशू के हर इलाज में जीवित है। उसकी याद हर गाँव, हर मरीज, हर बूढ़ी आँखों में झलकती है।

यह कहानी हमें यही सीख देती है कि—

प्यार कभी समाप्त नहीं होता।
वह मन से निकलकर सेवा बन जाता है…
और सेवा ही वह दीपक है जो दुनिया को रोशन करता है।