#कथा प्रारंभ मिथिला की पावन धरती, दरभंगा शहर के लहेरियासराय की एक पुरानी मगर चहल-पहल वाली गली में एक अनोखा मोहल्ला था। यहाँ हर घर की अपनी कहानी थी, हर छत की अपनी राजनीति और हर दरवाज़े की अपनी जासूसी।

इसी गली में रहते थे शिवनाथ झा काका।
काका उम्र में साठ के पार, सफेद दाढ़ी, मोटा चश्मा और गले में हमेशा गमछा। दिल के बुरे नहीं थे, पर एक आदत थी— मुफ़्त की चीज़ का जबरदस्त शौक।

खासकर,
पड़ोसियों के वाई-फाई का।

जब से मैंने अपने घर में तेज़ इंटरनेट लगवाया था, काका का फोन दिन-रात मेरे नेटवर्क से जुड़ा रहता था। कभी-कभी वे गली में मिलते तो मज़ाक उड़ाते—
“अरे बेटा, आजकल सब कंजूस हो गया है, पासवर्ड छुपा-छुपाकर रखता है। हमरे जमाने में तो सब कुछ साझा होता था!”

मैं मुस्कुरा देता, मगर अंदर ही अंदर एक योजना पक रही थी। क्योंकि मैं जब भी अपने आफिस का काम करने बैठता। नेट बहुत स्लो हो जाता था। क्योंकि सारा डाटा मंगनिया काका के घर के भीतर ही रह जाता था।

एक दिन दोपहर को काका अपने कमरे में बैठे थे। बाहर धूप थी, पंखा धीमी गति से घूम रहा था और काका ने मन बनाया—
“आज नई भोजपुरी फिल्म डाउनलोड कर लिया जाए।”

उन्होंने मोबाइल खोला और टाइप किया—
फिल्म-भोजपुरी.कॉम

जैसे ही उन्होंने वेबसाइट खोली, अचानक स्क्रीन पर एक सफेद वस्त्रधारी बाबा जी प्रकट हो गए। आँखें लाल, आवाज़ गंभीर और हाथ में डंडा।

बाबा जी चिल्लाए—
“बेटा! पराया धन मिट्टी के समान है।
दूसरों की संपत्ति पर नज़र डालना अधर्म है!”

काका हक्के-बक्के रह गए।
“ई का हो गया! कहीं वायरस तो नहीं लग गया?”

उन्होंने तुरंत गूगल खोला—
वहां पर भी वही बाबा जी।

फेसबुक खोला—
वहां भी बाबा जी, और नीचे लिखा था—
“एक सभ्य पड़ोसी कैसे बनें?”

यूट्यूब खोला—
तो वहां भी मैसेज आया
“मुफ़्तखोरी के दुष्परिणाम – एक सामाजिक संदेश।”

काका का माथा ठनक गया।
“अरे आजकल तो इंटरनेट भी ज्ञान बाँटने लगा है!”

दोपहर तक काका का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने लहेरियासराय से प्रसिद्ध मोबाइल मैकेनिक भोलू मिस्त्री को बुला लिया।

भोलू आया—
हाथ में टूल किट, कान में ईयरफोन और मुँह में पान।

दो घंटे तक उसने मोबाइल, टीवी और राउटर को उलट-पलट कर देखा।
कभी फोन रीस्टार्ट किया, कभी सेटिंग बदली, कभी तार चेक किया।

आखिर पसीना पोंछते हुए बोला—

“काका, आपके फोन में कोई वायरस नहीं है।
ई तो वाई-फाई ही अजीब है।
इसमें खाली प्रवचन ही लोड हो रहा है।
लगता है इस घर पर देवता का साया है
या फिर राउटर में ही संस्कार आ गए हैं!”

काका ने माथा पकड़ लिया।
“संस्कार वाला राउटर! हमरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?”

मिस्त्री से कुछ हुआ तो नहीं फिर भी उन्होंने भोलू को उसका चार्ज पकड़ा दिए।

भोलू गली में निकलते ही ऐलान करने लगा—

> “अरे सुनो! शिवनाथ झा काका के फोन में खाली प्रवचन चलता है!
उनका वाई-फाई भगवान वाला हो गया है!”

पूरा मोहल्ला हँसी से गूँज उठा।

मेरे घर काका की फरियाद

शाम को काका उदास चेहरे के साथ मेरे घर पहुँचे।
गमछा कंधे पर, चश्मा नाक पर और आवाज़ में थकान।

“बेटा… वो… ज़रा अपना नेट देख लेना।
हमरे यहाँ कुछो नहीं चल रहल है।”

मैंने बड़े मासूम चेहरे से अपना फोन दिखाया,
जो मेरे गुप्त नेटवर्क से जुड़ा था।

“अरे काका, हमारा तो रॉकेट की तरह चल रहा है।
देखिए—HD फिल्म कितनी जल्दी लोड हो रही है!”

काका ने आँखें फाड़कर देखा।
फिल्म चल रही थी, कोई बाबा नहीं, कोई प्रवचन नहीं।

मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“वैसे काका, आपने ही तो कहा था कि मैं कंजूस हूँ।
तो मैंने सोचा, शायद भगवान ने आपकी सुन ली
और मेरे वाई-फाई को आपके लिए ‘पवित्र’ बना दिया।”

काका सब समझ गए।
तकनीकी खेल भी, ताना भी, और अपनी मुफ़्तखोरी भी।

पर बोले कुछ नहीं।

अगले दिन पूरे मोहल्ले में चर्चा थी—
“काका के घर प्रवचन वाला इंटरनेट!”
“काका को बाबा जी इंटरनेट ने सुधार दिया!”
“अब मुफ्त में नेट नहीं लेंगे!”

बच्चे काका को देखकर कहते—
“नमस्ते बाबा जी के भक्त!”
और भाग जाते।

काका की प्रतिष्ठा गली में गिर चुकी थी।
उन्हें समझ आ गया था कि
मुफ़्तखोरी भी एक सामाजिक अपराध है।

अगले दिन सुबह गली में सफेद रंग की गाड़ी आई।
बैनर लगा था—
इंटरनेट फाइबर ब्रॉडबैंड

काका ने अपना निजी इंटरनेट लगवा लिया था।

इंस्टॉलर ने पूछा—
“पासवर्ड क्या रखें, सर?”

काका बोले—
“सभ्य_पड़ोसी_2026”

पूरा मोहल्ला हँस पड़ा।

आज भी जब काका मुझे गली में देखते हैं,
तो नज़रें चुरा लेते हैं।
कभी-कभी मुस्कुरा देते हैं,
जैसे कह रहे हों—
“ठीक है बेटा, सीख गया।”

और मैं?
अपने तेज़ इंटरनेट पर आराम से बैठकर
मनपसंद फिल्म देखता हूँ—
बिना बफरिंग, बिना प्रवचन, बिना मंगनिया काका के 😄

मिथिला के मोहल्लों में शांति बनाए रखने के लिए
कभी-कभी डिजिटल डंडा उठाना ही पड़ता है।
मुफ़्तखोरी छोड़िए,
अपना कनेक्शन लीजिए,
और सभ्य पड़ोसी बनिए।