#MNN24X7 कथा आरंभ
मिथिला की धरती…
जहाँ हर सुबह सिर्फ सूरज नहीं उगता,
बल्कि उम्मीदें भी जन्म लेती हैं।
दरभंगा और मधुबनी के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था — बसही चकवा।
गाँव छोटा था, लेकिन सपने बहुत बड़े।
सुबह के ठीक 6:55 बज रहे थे…
हल्की धुंध अभी भी खेतों पर पसरी हुई थी…
और उसी धुंध को चीरता हुआ एक आदमी साइकिल से तेज़ी से स्कूल की ओर बढ़ रहा था।
उसका नाम था — शशिभूषण झा।
लेकिन पूरे इलाके में लोग उन्हें एक ही नाम से जानते थे —
“मास्टर साहेब”।
उनकी साइकिल पुरानी थी…
चेन कभी-कभी आवाज़ करती थी…
ब्रेक भी ढीले थे…
लेकिन उनके इरादे… बिल्कुल मजबूत थे।
स्कूल का नाम था — “विद्या भारती प्राइवेट स्कूल, बसही”।

घंटी 7 बजे बजती थी…
लेकिन मास्टर साहेब रोज 5 मिनट पहले पहुँच जाते थे।
क्योंकि उन्हें पता था—
अगर वो लेट हुए…
तो सबसे पहले सवाल उन्हीं से होगा।
गेट पर पहुँचते ही चौकीदार भोला काका ने मुस्कुराते हुए कहा—
“का हो मास्टर साहेब… आजो टाइम से पहले?”
शशिभूषण झा हल्का सा मुस्कुराए—
“बच्चा सब टाइम से पहले आ जाता है भोला काका… गुरु लेट कैसे हो सकता है?”
क्लास शुरू हुई…
“सर! ये मैथ्स का सवाल समझ में नहीं आया…”
“सर! ये ग्रामर कैसे होगा?”
“सर! होमवर्क चेक कर दीजिए…”
बच्चों की आवाज़ें एक साथ गूंज उठीं।
शशिभूषण झा ने बोर्ड पर चॉक उठाया…
और धीरे-धीरे समझाना शुरू किया।
“देखो… सवाल से डरना नहीं है… सवाल तुमसे डरना चाहिए…”
पूरी क्लास हँस पड़ी…
लेकिन उसी हँसी में सीख छुपी थी।
वो सिर्फ किताब नहीं पढ़ाते थे…
वो बच्चों के अंदर का डर मिटाते थे।
हर बच्चे को नाम से जानते थे…
किसके घर की हालत कैसी है…
किसके पिता मजदूर हैं…
किसकी माँ खेत में काम करती है…
सब कुछ।
दोपहर तक पढ़ाने के बाद…
जब बाकी शिक्षक आराम करने चले जाते थे…
शशिभूषण झा स्कूल के एक कोने में बैठकर बच्चों की कॉपियाँ चेक करते रहते थे।
उनके पास कोई शिकायत नहीं थी…
कोई गिला नहीं था…
बस एक जुनून था —
“बच्चे आगे बढ़ें…”
लेकिन स्कूल की दीवारों के बाहर…
उनकी अपनी जिंदगी कुछ और ही कहानी कहती थी।
उनका घर गाँव के आखिरी छोर पर था…
एक छोटा-सा कच्चा मकान…
छत से कभी-कभी पानी टपकता था…
पत्नी — कुमुदिनी देवी
बेटा — मनीष (कक्षा 9)
बेटी — छोटी रानी (कक्षा 6)
शाम को जब वो घर पहुँचे…
तो कुमुदिनी देवी ने पूछा—
“आज सैलरी मिली?”
शशिभूषण कुछ पल चुप रहे…
फिर धीरे से बोले—
“अभी नहीं… अगले हफ्ते देंगे…”
कुमुदिनी ने कुछ नहीं कहा…
बस चूल्हे में लकड़ी डाल दी।
क्योंकि वो जानती थी—
ये “अगला हफ्ता” कई बार महीनों तक खिंच जाता है।
महीने के अंत में…
जब आखिरकार सैलरी मिली…
7,000 रुपये।
शशिभूषण ने पैसे हाथ में लिए…
कुछ देर तक देखते रहे…
उसी दिन बाजार में उन्होंने एक मोबाइल दुकान के बाहर लिखा देखा—
“EMI — 7,500 रुपये प्रति महीना”
वो कुछ देर तक उस बोर्ड को देखते रहे…
फिर हल्का सा मुस्कुराए—
“मेरी सैलरी… एक मोबाइल से भी कम…”
लेकिन अगले ही पल उन्होंने सिर उठाया और खुद से कहा—
“लेकिन मैं मोबाइल नहीं… इंसान बना रहा हूँ…”
उनकी यही सोच… उन्हें हर दिन आगे बढ़ाती थी।
स्कूल के बाद…
जब बाकी शिक्षक घर चले जाते थे…
शशिभूषण झा अक्सर घर नहीं जाते थे।
वो गाँव की पुरानी लाइब्रेरी में बैठ जाते थे।
लाइब्रेरी में ज्यादा कुछ नहीं था—
पुरानी किताबें… टूटी कुर्सी…
और दीवारों पर जमी धूल…
लेकिन शशिभूषण के लिए वही जगह सबसे कीमती थी।
वो घंटों पढ़ते रहते…
क्योंकि उन्हें पता था—
अगर वो खुद आगे नहीं बढ़ेंगे…
तो बच्चों को आगे कैसे बढ़ाएंगे?
एक दिन क्लास में एक नया बच्चा आया।
नाम था — हीरा मंडल।
फटी हुई शर्ट…
नंगे पैर…
लेकिन आँखों में एक अजीब सी चमक।
शशिभूषण ने पूछा—
“नाम क्या है?”
“हीरा…”
“पढ़ना चाहते हो?”
“बहुत… लेकिन घर में पैसे नहीं हैं…”
पूरी क्लास शांत हो गई।
शशिभूषण कुछ पल तक उसे देखते रहे…
फिर बोले—
“आज से तुम मेरी जिम्मेदारी हो…”
उस दिन से हीरा रोज सबसे पहले स्कूल आने लगा…
और सबसे आखिरी जाने लगा।
शशिभूषण उसे अलग से पढ़ाते…
कभी-कभी अपने घर भी बुला लेते।
कुमुदिनी पूछती—
“ये बच्चा कौन है?”
वो मुस्कुरा कर कहते—
“हमर सपना है…”
गाँव के कुछ लोग ताने मारते—
“अरे मास्टर… फ्री में पढ़ा के का मिलेगा?”
“खुद के घर में पैसे नहीं… दूसरों को पढ़ा रहे हैं…”
शशिभूषण बस मुस्कुरा देते…
क्योंकि उन्हें पता था—
बीज बोने वाला कभी तुरंत फल नहीं मांगता।
समय बीतता गया…
हीरा दिन-रात मेहनत करता रहा…
और फिर आया दसवीं का रिजल्ट…
पूरा गाँव स्कूल के बाहर जमा था…
रिजल्ट बोर्ड पर लिखा था—
हीरा मंडल — 95%
पूरा गाँव चौंक गया…
“अरे ये वही हीरा है?”
“जो नंगे पैर आता था?”
हीरा दौड़ता हुआ आया…
और सीधे शशिभूषण के पैर पकड़ लिए—
“सर… ये सब आपकी वजह से…”
उस दिन शशिभूषण की आँखों में आँसू थे…
लेकिन वो आँसू दुख के नहीं…
गर्व के थे।
साल बीतते गए…
मनीष बड़ा हुआ…
छोटी रानी भी कॉलेज चली गई…
लेकिन शशिभूषण की जिंदगी वही रही…
साइकिल… स्कूल… लाइब्रेरी…
बस एक चीज बदली—
उनके स्टूडेंट्स की संख्या।
अब गाँव के हर घर में उनका कोई न कोई छात्र था।
एक दिन…
गाँव में एक बड़ी गाड़ी आई…
लोग इकट्ठा हो गए…
उसमें से एक युवक उतरा—
सूट-बूट में… आत्मविश्वास से भरा…
वो सीधे शशिभूषण के घर गया…
दरवाजा खटखटाया…
“सर… पहचानिए मुझे…”
शशिभूषण ने गौर से देखा…
फिर उनकी आँखें चमक उठीं—
“हीरा…?”
वो मुस्कुरा दिया—
“हाँ सर… आपका हीरा…”
अब हीरा एक बड़ा अफसर बन चुका था।
उसने कहा—
“सर… आज मैं जो भी हूँ… आपकी वजह से हूँ…”
और फिर उसने झुककर उनके पैर छुए…
पूरा गाँव ये दृश्य देख रहा था…
जो लोग कभी ताने मारते थे…
आज ताली बजा रहे थे।
शशिभूषण झा चुपचाप खड़े थे…
उनके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान थी…
लेकिन आज उसमें एक अलग ही चमक थी।
उस रात…
वो अपने आँगन में बैठे थे…
आसमान की तरफ देख रहे थे…
और धीरे से बोले—
“भगवान… मैंने जिंदगी में पैसा नहीं कमाया…
लेकिन आज समझ आया…
मैं सबसे अमीर हूँ…”
क्योंकि—
उनके पास हजारों स्टूडेंट्स थे…
जो आज भी उन्हें दिल से याद करते थे…
जो आज भी उन्हें “मास्टर साहेब” कहकर सम्मान देते थे…
और सच यही है—
प्राइवेट टीचर की सैलरी छोटी हो सकती है…
लेकिन उसकी जिम्मेदारी दुनिया की सबसे बड़ी होती है।
वो सिर्फ पढ़ाता नहीं…
वो जिंदगी बनाता है…
और उसकी असली कमाई…
उसके स्टूडेंट्स होते हैं।

आशुतोष कुमार झा
