#MNN24X7 कथा प्रारंभ

मिथिला के शांत गांव नवटोला में
वर्षों तक जीवन अपनी सहज
गति से चल रहा था—
दोपहर में दीदी के आँगना के
भनसाघर से उठती धुँआरी खुशबू,
बरामदे में बैठकर काकी, चाची और
दादी का मैथिली-गीत गाना,
आँगन और बाहरी बरामदे में
कच्ची मिट्टी पर बनते घर के संस्कार–चिह्न…और तस्वीर।
सबकुछ ठीक-ठाक,चल रहा था।
अपनी परंपरा और अपनापन लिए।

मगर कठिन परंपरा और संस्कार के बीच
धीरे-धीरे एक धुंधली छाया
सुविधा के नाम पर मिथिला की
धरती पर उतरने लगी थी।
पहले तो वो लोगों को आकर्षक ही लगे—
सौदागर बनकर आए बाहरी लोग।
सस्ता सामान, चमकीले वादे, और
हर समस्या का आसान समाधान।

गाँव के युवक रविन्द्र, नूनू कक्का का
भतीजा मनोज, और अभि—
तीनों ने शुरुआत में इसे विकास समझा।
सौदागर जमीन खरीद रहे थे,
दुकानें खोल रहे थे,
पैसों का लेन-देन बढ़ रहा था।
किसी को बुरा नहीं लगा—
क्योंकि सब सोचते थे, “ठीक है, फायदा ही होगा।”

पर बदलाव धीरे-धीरे धारदार हो गया।

सौदागर ने व्यापार से आगे बढ़कर
सत्ता पर अपनी पकड़ बना ली।
मगर उनका सबसे बड़ा हमला
किसी जमीन या सत्ता पर नहीं,
बल्कि संस्कृति और संस्कार पर था।
जो आगे पता चला।

अब हरेक स्थानीय तीज-त्योहार
उनके लिए बस एक व्यापार का मौसम बन चुका था।
न क्वालिटी, न शुद्धता—
बस बाजार की चकाचौंध और लाभ का हिसाब।
नूनू कक्का अकसर रूंधे गले से कहते—
“बेटा, जहां हम पूजा कर के मन हल्का करते थे,
अब वहाँ डिस्काउंट के बोर्ड टँगे रहते हैं।”

रविन्द्र भाई की पीड़ा और गहरी थी।

जब उन्हीं सौदागरों के लोग
मिथिला के विध-व्यवहार, रीति-रिवाज,
और घर के शुद्ध संस्कार का मजाक उड़ाने लगे—
तो रविन्द्र के शब्द काँप गए—

“अब तो हमारे घर की परंपराओं को
बेकार और पिछड़ा कहकर हँसते हैं ये लोग।
हमारे गीत, व्याह-व्यवहार, स्त्रियों का पहनावा—
सबका मजाक उड़ाने में सबसे आगे यही हैं!”

मणि झा, जो पढ़ाई करके अभी-अभी गाँव लौटा था,
धीरे से बोला—

“पानी अब सिर के ऊपर आ चुका है।
ये लड़ाई राजनीति की नहीं,
पहचान की है।
अगर आज नहीं बोले—
तो कल मिथिला का नाम भी
इनके व्यापार की रजिस्टर-बुक में दब जाएगा।”

तीनों युवक रात-भर बैठक करते रहे।
आँगन में लालटेन की रोशनी,
मधुबनी पेंटिंग से रंगी दीवारों पर पड़ती परछाइयाँ—
और उनकी आँखों में मिश्रित पीड़ा और आग।

निर्णय लिया गया

उन्होंने सोच लिया था।
डरकर चुप रहने के दिन अब खत्म होंगे।
अब उनको उनही की भाषा में जवाब देने का समय आ गया है— संस्कृति से, साहित्य से, और संगठित प्रतिरोध से।

हम गाँव-गाँव जाएंगे, लोगों को बतायेंगे—
कि संस्कृति कोई सामान नहीं,
जिसे बोरा भर के खरीदा-बेचा जाए।
यह घर की मिट्टी से जन्मी वह पहचान है
जिसे खो देने के बाद
मनुष्य बस भीड़ का हिस्सा रह जाता है।

यहीं से शुरू होती है मिथिला के युवाओं की
“अपनी मिट्टी बचाने की लड़ाई।”

“अब जाग उठा है मिथिला का बेटा”

नवटोला के उस शांत गाँव में,
जिसकी सुबहें मैथिली गीतों से खुलती थीं,
अब एक नई हलचल पैदा होने लगी थी।

बैठक का पहला संकल्प

नूनू कक्का का पुराना आँगन—
जहाँ कभी सामूहिक पंचैती हुआ करता था—
अब युवाओं की गुप्त बैठकों का केंद्र बन चुका था।

रविन्द्र ने दरी पर बैठते ही कहा—
“हमारी संस्कृति पर हमला हुआ है।
अब बस बैठकर देखने से काम नहीं चलेगा।
मिथिला की मिट्टी हमको पुकार रही है।”

अभि ने धीरे से कहा—
“सौदागर ने व्यापार से शुरुआत की थी,
अब पहचान पर कब्जा कर रहे हैं।
हमारे त्योहारों की पवित्रता छीन ली गई है।”

मणि झा ने अपनी नोटबुक खोली—
“हम तीनों काफी नहीं हैं।
पूरे इलाक़े को जोड़ना होगा।
पहचान बचाने की लड़ाई
भीड़ से नहीं, बुद्धि और एकता से जीतनी होगी।”

यहीं से पहला संकल्प बना—
“मिथिला जागेगी।”

—पहली जनसभा

पगडंडी के पास पुरानी पीपल की छाँव में
एक छोटी जनसभा बुलाई गई।
गाँव की स्त्रियाँ, बुजुर्ग, किसान,
और पढ़ाई कर चुके कई युवक जुटे।

रविन्द्र ने खड़े होकर कहा—
“हमारी संस्कृति कोई फैशन नहीं
जिसे सौदागर बदल दें।
ये हमारी नस्ल का रक्त है।
हम इसे टूटने नहीं देंगे।”

पीछे बैठी एक बुजुर्ग अम्मा फफक पड़ी—
“बेटा, अब तो छठ का घी भी नकली,
मिथिला पाग भी प्लास्टिक का,
महादेव-पूजा में भी विद्यापति गीत के बदले loudspeaker की धुन! मैथिली गीत तो अब सुनाई ही नहीं देता है और अगर सुनो तो वो भी अश्लील।
हमारी आत्मा सूख रही है!”

सभा में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।

फिर वही सन्नाटा—
गुस्से में बदल गया।
आपसी सहमति बनी।
सभी ने कहा हम भी अपनी माटी पानी के लिए लड़ मरेंगे।
सभा समाप्त हुई मगर इसके साथ ही
शुरुआत हुई एक नयी
क्रांति की

मगर मिथिला सदैव चुगला, चमचा
और बेलचा से परेशान रहा है।
अस्तु यह बात भी आगे बढी
जब यह सब बातें सौदागरों तक पहुँचीं,
तो उन्होंने गाँव में अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं—

“ये वही युवा हैं जो विकास रोकना चाहते हैं।”
“ये सब पुराने जमाने के लोग हैं।”
“इनकी बात मत सुनो, ये प्रगति के दुश्मन हैं।”

कुछ स्थानीय लोग लालच में आ गए।
उनको सबका मालिक एक है भी
याद आने लगा था मगर
अधिकांश ने महसूस यही किया—
कि विकास के नाम पर
उनकी आत्मा छिनी जा रही है।

— युवाओं की रणनीति तैयार होती है

रात में फिर बैठक हुई।

अभि बोला—
“सिर्फ भाषण से कुछ नहीं होगा।
हमें सांस्कृतिक अभियान प्रारंभ करने चाहिए।”

मणि ने योजना बताई—

1. मिथिला लिपि और लोककला शिविर का आयोजन

2. शुद्ध त्योहार आंदोलन – नकली सामान का बहिष्कार।

3. ग्राम-ग्राम सांस्कृतिक जागरण,कीर्तन नवाह का आयोजन।

4. युवा दस्ते – जो घर-घर जाकर वास्तविक परिस्थिति देखेंगे और रोजगार सहायक योजना बनायेंगे।

5. साहित्य और लोकगीत का पुनर्जागरण। आयोजन कोई भी हो मगर मैथिली गीत संगीत को प्रोत्साहन।

नूनू कक्का गर्व से बोले—
“एहि बेर मिथिला के बेटा चुप नहि रह बला अछि।” आब करू नै त बैसल-बैसल सरू। बला हाल भ गेल अछि।

— बदलाव की पहली किरण

अगली सुबह जब युवक निकलने लगे,
तो गाँव की बच्चियाँ मधुबनी रंग भर रही थीं,
स्त्रियाँ असली घी से दीप बना रही थीं,
और बुजुर्ग गर्व से कह रहे थे—

“आब जुलुम हमरा सहलो नै जाएत!
हमरा संस्कृति आब नेने सब बचायत!”

यह सब देखकर
सौदागर के लोग चौंक गए।
बरसों में पहली बार
उन्होंने गाँव के लोगों के चेहरे पर
इतनी एकजुटता देखी थी।

—“सांस्कृतिक संघर्ष का चरम”

नवटोला में जागरण की हवा तेज हो चुकी थी।
गाँव के बच्चे–बच्चे तक को पता था—
“हमारी पहचान बिकने नहीं दी जाएगी।”

पर जैसे ही मिथिला में एकता बढ़ी,
सौदागर भी शांत नहीं बैठे रहने वाले नहीं थे।

— सौदागर की नई चाल

नए सप्ताह तक सौदागर के प्रतिनिधि गाँव-गाँव घूमने लगे।

वे कहते—
“देखिए, ये युवा विकास रोकना चाहते हैं।”
“परंपरा के नाम पर आपको पिछड़ा रखेंगे।”
“हम आपके बच्चों को नौकरियाँ देंगे, बस हमारा साथ दीजिए।”

कुछ लोग लालच में बहक भी गए।
पर अभि ने तुरंत जनसभा बुलाई उसने कहा—

“सुन लीजिए, भैया नौकरी का लालच देकर
पहचान नहीं बेची जाती।
जो अपनी संस्कृति छोड़ देता है,
वह अपनी आत्मा भी खो देता है।”

लोगों के चेहरे गंभीर हो गए।
भीड़ ने एक स्वर में कहा—
“हम मैथिल, बिकने वाली जाति नहीं हैं!”
अरे! अंग्रेज भी हमारी भाषा संस्कार और संस्कृति को
नहीं मिटा सके थे। और तुम तो छोटे सौदागर हो।

— युवाओं का अभियान – हर घर मिथिला

एक बड़ी योजना शुरू हुई—
“हर घर मिथिला”।

इस अभियान में शामिल था—

अनिवार्य मिथिला पाग, गमछा और मखान।

त्योहारों में घरेलू शुद्ध सामग्री का उपयोग।

घर-घर मिथिला पेंटिंग जनेऊ व चरखा प्रशिक्षण।

स्त्रियों के लिए मैथिली गीत आ संस्कृति मंडली।

बच्चों के लिए मैथिली लेखन सीखने के सत्र

देखते ही देखते
नवटोला ही नहीं,
पास-पड़ोस के आठ-दस गाँव भी इस आंदोलन से जुड़ गए।

— संघर्ष की आग अब सत्ता तक पहुँची

सौदागर ने स्थानीय नेताओं पर दबाव डाला—
“इन युवकों की आवाज़ दबाओ,
नहीं तो हमारा व्यापार ठप हो जाएगा।”

उनके कहने पर
नेता गाँव में आए,
पर युवाओं ने शांति से कहा—

“हम लड़ाई नहीं चाहते,
बस अपना सम्मान वापस
पाना चाहते हैं। हमें चाहिए
हमारा घर, हमारी संस्कृति और
हमारी पहचान।”

लोगों की ऐसी एकता देख
नेताओं की आवाज खुद धीमी पड़ गई।
उन्होंने चुपचाप खिसकने में ही भलाई समझी

— पहला बड़ा टकराव

एक दिन सौदागरों ने गाँव के चौराहे पर
एक बड़ा आधुनिक “फेस्ट” लगाने की योजना बनाई।
लाउड म्यूज़िक, चमकदार स्टॉल,
और स्थानीय दुकानों को हटाने का आदेश मिला।

ये वही जगह थी जहां वर्षों से छठ, सामा-चकेबा, झिझिया और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों होते आ रहे थे।
पुरना पोखरि का वही भींडा।

यह सब देख कर
रविन्द्र ग़ुस्से में नहीं,
बल्कि दृढ़ होकर बोला—

“ये जगह आपकी दुकान नहीं,
हमारी परंपरा का हृदय है।
इसे छीना नहीं जाएगा।”

युवाओं ने शांतिपूर्ण धरना शुरू कर दिया।
स्त्रियाँ पूजन थाल लेकर बैठ गईं।
बुजुर्ग आशीर्वाद देते खड़े रहे।
बच्चे मैथिली गीत गाने लगे।

पूरा दृश्य ही बदल गया।

सौदागर पीछे हटने पर मजबूर हो गए।

—मिथिला की पुकार – पूरे जिले में फैल गई

खबर फैलते ही बड़े-बड़े मिडिया
संस्थान से पत्रकार आए,
स्थानीय रेडियो ने भी
आवाज़ उठाई—

“नवटोला में संस्कृति की रक्षा का संग्राम।”

सोशल मीडिया पर
हैशटैग चला—
#मिथिला_जगतै
#संस्कार_बचाउ_अभियान

अब यह संघर्ष सिर्फ एक गाँव का नहीं,
पूरे जिले का आंदोलन बन चुका था।

–“यही वह समय था जब मैथिल भाईयों ने खुद मिथिला को बचाया”

नवटोला के संघर्ष ने सौदागरों की
नींद हराम कर दी थी।
उनकी सत्ता, पैसा, धौंस—
सब धीरे-धीरे कमजोर होने लगा था,
क्योंकि अब लोगों में जागृति आ चुकी थी।

पर आखिरी वार बाकी था।

—सौदागर की अंतिम चाल – “सांस्कृतिक कब्ज़ा”

एक सुबह खबर फैली—
सौदागरों ने जिला मुख्यालय में
“नया सांस्कृतिक केंद्र” खोलने का ऐलान कर दिया।

पर भीतर की योजना कुछ और थी—

मिथिला के त्योहारों के स्वरूप को बदलना

विधि-व्यवहार के नाम पर दिखावा करना

लोककला को चमकीला बनाकर “बाहरियों” की पसंद के अनुसार उसे बाजार में बेचना

और अंततः मौलिक संस्कृति को मिटाना

रविन्द्र ने घोषणा पढ़कर गुस्से से मुट्ठी भींच ली।

“ये अंतिम चोट है।
अगर इसे नहीं रोका,
तो हमारी पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी।”

— युवाओं की निर्णायक सभा

पुराने पीपल के नीचे सब इकट्ठा हुए।

मणि झा खड़े हुए—
“हम बिना हिंसा के संघर्ष करेंगे।
मिथिला का हथियार—
गीत, कला, साहित्य, और एकता है।”

अभि बोला—
“आज रात जिला मुख्यालय तक पैदल यात्रा।
कल सुबह—
मिथिला सत्याग्रह।”

गाँव के बुजुर्गों ने आशीर्वाद दिया।
स्त्रियों ने अपनी चादरों पर मिथिला के प्रतीक बनाए।
बच्चों ने पाग पहनकर नारा लगाया—

“हमर मिथिला छी!
हमारी संस्कृति अमर छी!”

—ऐतिहासिक पदयात्रा

सैकड़ों लोग हाथों में मशाल लिए,
मैथिली गीत गाते हुए रात में चल पड़े।

“हमर संस्कृति, हमर शान!”
“नकलीपन के खिलाफ जन-आंदोलन!”
“मिथिला के रंग के साथ दगाबाज़ी नहीं!”

रात का अंधेरा
इन आवाज़ों के आगे छोटा पड़ गया।

सॉरी पापा (एक मार्मिक कहानी)@MNN24X7

—जिला मुख्यालय पर मुक़ाबला

सुबह होते-होते
सौदागरों का पूरा तंत्र तैयार खड़ा हो गया था।
गार्ड, माइक वैन, झूठे नेता, चमकीले पोस्टर…

पर उधर से आते हुए
मिथिला के लोग—
बिना हथियार,
बिना डर,
सिर्फ पहचान की लौ लेकर।

रविन्द्र सबसे आगे बढ़ा—
“ये ज़मीन व्यापार का मैदान नहीं—
ये हमारी आत्मा है।”

भीड़ ने एक स्वर में गूँज उठाई—

“मिथिला मिटेगी नहीं!”

सौदागर ने मंच पर आकर कहा—
“हम विकास ला रहे हैं, तुम लोग रुकावट।”

तभी नूनू कक्का की आवाज़ पूरी भीड़ को चीरते हुए निकली—

“विकास वो होता है बेटा,
जो जड़ों को काटकर नहीं,
जड़ों को मजबूत करके आता है!”

सन्नाटा छा गया।

–निर्णायक पल – जब मिथिला ने जीत दर्ज की

सौदागर ने बुरी तरह झल्लाकर
कार्यक्रम शुरू करने की कोशिश की।

पर तभी—

स्त्रियों का समूह आगे आया,
और साड़ियों को चादर की तरह फैलाकर
मंच के सामने खड़ी हो गयीं।

बच्चे मिथिला लिपि के पोस्टर उठाए खड़े थे।
युवक मैथिली गीत गा रहे थे।
गाँव के बुजुर्ग माथे पर पाग बाँधे,
पूरे सौम्य आत्मविश्वास के साथ
सत्संग की तरह शांतिपूर्ण विरोध के लिए
आगे बढ़ रहे थे।

सौदागर कुछ भी नहीं कर पाये।
इतनी विशाल, शांत, दृढ़ एकता—
कोई भी शक्ति उनको रोक नहीं सकी।

अंततः जिला प्रशासन ने घोषणा की—

“नया सांस्कृतिक केंद्र
मैथिल समुदाय की देखरेख में ही चलेगा।
किसी भी परंपरा को बदला नहीं जाएगा।
और कोई भी दूसरा व्यक्ति किसी के परंपरा को
संचालित नहीं कर सकेगा।”

भीड़ से नारा फूट पड़ा—

“जय मिथिला!”

सौदागरों की साम्राज्यवादी योजना
यहीं समाप्त हो गई।

— नई शुरुआत

गाँव लौटते समय
पूरा नवटोला
दीपों से जगमगा रहा था।

हर घर की दीवार पर
मिथिला पेंटिंग की नई कूची चली थी।
हर चौक पर मैथिली गीत का आयोजन।

रविन्द्र ने आसमान की ओर देख कर कहा—
“आज पहचान की लड़ाई हमने जीत ली।”

मणि झा बोला—
“पर यात्रा अभी बहुत लंबी है।”

अभि ने मुस्कुराकर कहा—
“अब कोई सौदागर हमारी आत्मा नहीं खरीद सकेगा।”

और दूर कहीं,
फसल की खुशबू और लोकगीत की धुन में,
किसान खेत में गीत गा रहे थे,
और
मिथिला मुस्कुरा रही थी।

यह सिर्फ जीत नहीं थी—
बल्कि मिथिला का पुनर्जन्म था।

सूखी पगडंडी फिर हरी होगी।( कहानी)@MNN24X7


(यह कथा काल्पनीक है।)