#MNN24X7 कथा प्रारंभ
प्रतापपुर के पूरब में एक पगडंडी है—धूप में फटी, बारिश में कीचड़ में लथपथ, हवा चलने पर धूल उड़ाती हुई। सत्यनगर के लोग इसे “भाग्य-मार्ग” कहते थे; क्योंकि यही वह रास्ता था जिसके सहारे गाँव के सपने शहर की ओर उड़ान भरते, और इसी से लौटकर थकान, निराशा और टूटे मन वाले चेहरे घर पहुँचते।

पगडंडी के उसी किनारे बसता था रविकांत झा का परिवार—पत्नी सुमन, बूढ़े लाल कक्का बड़ा भाई बिनोद, बच्चा कक्का,और उनका मासूम बेटा सरैज।
घर साधारण था, पर उम्मीदें बड़ी।
रविकांत सत्यनगर का तेज़तर्रार लड़का। स्कूल के मास्टर अक्सर कहते—
“ई बउआ के माथा में पूरा दुनिया बसल छै।”
इंजीनियर का सपना देखा, फिर डॉक्टर बनने की राह चुनी। NEET में 90 परसेंटाइल हासिल कर लौटा, तो सुमन ने दही-चीनी परोस दी, और बच्चा कक्का गर्व से बोले—
“सत्यनगर के झा सबहक नाक तऽ उँच भ’ गेल आइ।”
लेकिन खुशियों की उम्र छोटी निकली।
काउंसलिंग बोर्ड पर लाल अक्षरों में चमकता वाक्य—
“आपकी श्रेणी में सीट उपलब्ध नहीं।”
रविकांत की आँखों में जलता सवाल—
“मेहनत कम थी या मैं गलत घर में पैदा हुआ?”
लाल कक्का ने अपने जीवन की अंतिम जमा-पूँजी—प्रतापपुर की तीन कट्ठा उपजाऊ ज़मीन—बेच दी।
अब 70 लाख की फीस वाला निजी कॉलेज ही रास्ता था।
सुमन हर रात आँचल से आँसू पोंछकर बस इतना कहती—
“पढ़ू बाबू… अहीं आब हमारा सबहक दिन बदलब।”
—
सरैज छोटा था, पर घर की तंगी वह भी महसूस कर लेता।
दूध आधा होने लगा,
दीया देर से जलने लगा,
और लाल कक्का की ठोढ़ी पर थकान की रेखाएँ गहरी होती गईं।
वह धीरे से पूछता—
“माँ, हम्मर घर में ई कीये भ’ रहल छै?”
सुमन मुस्कान ओढ़ लेती—
“किछु नै बऊआ… बस उम्मीद कनी महँग पड़ल।”
—
उधर रविकांत का बड़ा भाई विनोद—सरकारी दफ़्तर का सीधा और ईमानदार कर्मचारी।
एक दिन आफिस मे उन्होंने बस इतना ही कहा—
“भाई, बात दबंगई से मत कहिए।”
बस, यही अपराध था।
अगले दिन उन पर जबरन आरोप,
लाठियाँ,
मुकदमा,
नौकरी खत्म।
और सम्मान? बहुत पहले जा चुका था।
दो साल की भागदौड़ के बाद जब प्रतापपुर लौटे,
सरैज ने पूछा—
“चाचा, ऑफिस अच्छा नहीं था क्या?”
विनोद टूटे स्वर में बोले—
“बऊआ… कुछ जगह हम जैसे लोगों के लिए नहीं बना है।”
अब वह सत्यनगर चौक पर ऑटो चलाते थे—शिकायतों से नहीं, पर भीतर से टूटे हुए।
—
हर शाम बच्चा कक्का चौकी पर बैठ जाते।
सरैज उनके पास जाकर पूछता—
“कक्का, ई सब हमरा संगे कीये भ’ रहल छै?”
कक्का धीरे से जवाब देते—
“जखन न्याय ताकति के घर में सूतल रहै छै,
आ नीति किताब सं नहि, डर से बनैत छै,
तखन मेहनत कर बला आदमी सदैव खालीए हाथ रहैत छै, बउआ।”
इन बातों को कहते हुए, उनकी आँखें नम हो जातीं।
—
उस रात लाल कक्का ने सबको बुलाया।
सत्यनगर की हवा भारी थी।
उन्होंने काँपती आवाज़ में जोश भर कर कहा—
“बऊआ… समय बदलबाक रहे तखन
आवाज़ उठाऊ,
नै तऽ चुप्पा ओछैना तैयार कऽ लिय।
चुप रहला सं सदैव जीत नुकैले रैह जाइत छै।”
उस रात रविकांत ने किताबें बंद कर दीं,
विनोद ने ऑटो की चाबी मेज़ पर रख दी,
और सरैज ने दादी का आँचल कसकर पकड़ लिया।
सत्यनगर की सूखी पगडंडी पर एक नये संकल्प ने जन्म लिया—“सहन से बेहतर है अधिकार माँगना। चुप्पी से बेहतर है सच बोलना।”
और इसी संकल्प ने बदलाव के बीज बोये।
—
समय बदला।
रविकांत की मेहनत रंग लाई।
सुमन की आँखों से आँसू हटे और मुस्कान लौट आई।
बच्चा कक्का की सीख अब पूरे गाँव की रोशनी बन चुकी थी।
आज भी पगडंडी धूप में फटती है,
बारिश में भीगती है,
पर अब उसकी मिट्टी में नया विश्वास उग आया है।
रविकांत की आवाज अब मिथिला के घर घर मे गूंज रही थी
की मिथिला की सूखी पगडंडी फिर हरी होगी।
मिथिला की धरती पर फैली वह सूखी पगडंडी—जिस पर सदियों की उपेक्षा की धूल जमी है—अब एक बार फिर हरी होने को है। समय के थपेड़ों ने भले उसे बेजान कर दिया हो, पर मिट्टी की नालियों में अभी भी वही पुरखों की जिद, वही संस्कृति की सुगंध और वही स्वाभिमान की नमी ज़िंदा है।
कंदर्पी के योद्धा, जो कभी ज्ञान, करुणा और वीरता के प्रतीक थे, आज फिर उठने को तैयार हैं—
पर यह लड़ाई तलवारों की नहीं, संस्कृति की होगी;
यह संघर्ष किसी के खिलाफ नहीं, अपने अस्तित्व के लिए होगा।
मिथिला सदियों से सभ्यता, शिष्टता और सहअस्तित्व की भूमि रही है। यहाँ संघर्ष का अर्थ कभी विनाश नहीं रहा; यहाँ आवाज़ का मतलब हमेशा जागरण रहा है। इसलिए हम बिना किसी को चोट पहुँचाए, बिना किसी को नीचा दिखाए—
अपनी भाषा, अपने संस्कार, अपनी पहचान और अपने मानवीय अधिकारों के लिए खड़े होंगे।
हमारी लड़ाई द्वेष की नहीं, दृढ़ता की होगी।
हमारा आंदोलन हिंसा का नहीं, विचार का होगा।
हमारी ताकत शोर में नहीं, एकजुटता में होगी।
मिथिला की यह पुकार किसी विद्रोह की गंध नहीं लाती;
यह पुकार है आत्मसम्मान की वापसी की।
यह पुकार है उस हर व्यक्ति के लिए जो मानता है कि पहचान छीनने से पहले पूछी जानी चाहिए, और सम्मान देने से पहले किसी को झुकाया नहीं जाना चाहिए।
आज जब लोग अपनी मूल पहचान भूलने लगे हैं, तब मिथिला फिर से अपने बच्चों को आवाज दे रही है—
“अपने अस्तित्व को याद करो, पर किसी को ठेस पहुँचाए बिना—
क्योंकि संस्कृति वही है जो जोड़ती है, तोड़ती नहीं।”
और निश्चय ही—
सूखी पगडंडी फिर हरी होगी।
कंदर्पी के योद्धा फिर आवाज़ उठाएँगे।
मिथिला फिर खड़ी होगी—अपने गौरव, अपने ज्ञान और अपने मानवीय अधिकारों के साथ।
क्योंकि सत्यनगर का एक परिवार चुप्पी की परंपरा को तोड़कर अपने अधिकारों के लिए खड़ा हुआ—
और जब पहला कदम उठता है,
तभी सूखी पगडंडी पर हरी घास उगती है।
