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#MNN24X7 कथा आरंभ कमलपुर में उस दिन की सुबह भी हर दिन की तरह ही शुरू हुई थी, लेकिन किसी को क्या पता था कि यह दिन एक ऐसी घटना को जन्म देगा, जो लंबे समय तक लोगों के दिलों में डर और सीख दोनों बनकर रह जाएगी। गाँव के बीचों-बीच स्थित पुराने पीपल के पेड़ के नीचे हमेशा की तरह कुछ बुजुर्ग बैठे थे, अपने जमाने की बातें कर रहे थे। वहीं से थोड़ी दूर पर मिट्टी का एक छोटा सा घर था, जहाँ रहती थीं गौरी देवी।

गौरी देवी की उम्र सत्तर के करीब थी, लेकिन उनके चेहरे की झुर्रियों में एक अजीब सी शांति और गरिमा थी। उनके कानों में झूलते सोने के कुण्डल उनकी पहचान थे। ये कुण्डल उनके पति रामबाबू सिंह ने शादी के समय पहनाए थे। रामबाबू अब इस दुनिया में नहीं थे, लेकिन उनके दिए ये कुण्डल गौरी देवी के लिए सिर्फ गहना नहीं, बल्कि उनका साथ, उनका प्रेम और उनकी यादें थे।

उस दिन गौरी देवी को अपने बेटे शिवनाथ के पास दरभंगा शहर जाना था। सुबह-सुबह उन्होंने स्नान किया, पूजा की और फिर अपनी पुरानी लेकिन साफ साड़ी पहन ली। जाते समय उन्होंने घर के दरवाजे को एक बार पीछे मुड़कर देखा, जैसे मन ही मन किसी से कह रही हों—“जल्दी लौट आऊँगी।”

गाँव से बस स्टैंड तक का रास्ता कच्चा था। रास्ते में उन्हें कई लोग मिले—कोई नमस्ते करता, कोई हाल पूछता। मिथिला की यही खासियत थी—यहाँ लोग अभी भी एक-दूसरे के जीवन में जुड़े हुए थे। लेकिन इसी अपनापन के बीच कभी-कभी खतरा भी छिपा होता है, यह बात गौरी देवी को उस दिन समझ में आने वाली थी।

बस स्टैंड पर पहुँचते ही उन्हें भीड़ का सामना करना पड़ा। लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे। कोई टिकट ले रहा था, कोई मोबाइल पर बात कर रहा था, तो कोई चाय की दुकान पर बैठा था। गौरी देवी एक कोने में जाकर बैठ गईं और अपने झोले को कसकर पकड़ लिया।

कुछ ही देर बाद दो युवक उनके पास आकर खड़े हो गए। दोनों की उम्र लगभग तीस-पैंतीस साल रही होगी। कपड़े साफ-सुथरे थे और चेहरे पर बनावटी विनम्रता थी। उनमें से एक ने मुस्कुराते हुए कहा, “माँजी, आप कमलपुर से आई हैं न?”

गौरी देवी ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा, “हाँ बेटा, लेकिन तुम कैसे जानते हो?”

दूसरा युवक तुरंत बोला, “अरे माँजी, हम भी उसी इलाके के हैं। आपके पति रामबाबू मास्टर को कौन नहीं जानता था?”

रामबाबू का नाम सुनते ही गौरी देवी का दिल पिघल गया। इतने सालों बाद किसी ने उनके पति को याद किया था। उन्होंने सहजता से बात शुरू कर दी। दोनों युवक बड़ी चतुराई से उनसे गाँव, रिश्तेदारों और पुरानी बातों के बारे में चर्चा करने लगे। वे इतनी सहजता से बातें कर रहे थे कि गौरी देवी को उनमें कोई संदेह नहीं हुआ।

धीरे-धीरे बातों का रुख बदलने लगा। एक युवक ने इधर-उधर देखते हुए कहा, “माँजी, आजकल बहुत चोरी-चकारी हो रही है। खासकर बस स्टैंड और बसों में।”

दूसरा बोला, “हमने तो अपनी माँ को मना कर दिया है कि सोना पहनकर बाहर न निकलें।”

गौरी देवी थोड़ा घबरा गईं। उन्होंने अपने कानों को छुआ, जहाँ उनके कुण्डल झूल रहे थे। वे कुछ सोच ही रही थीं कि पहले युवक ने कहा, “माँजी, आप चाहें तो हम एक उपाय बता सकते हैं। आप ये कुण्डल उतारकर कपड़े में बाँध लीजिए। सुरक्षित रहेगा।”

उसने अपनी जेब से एक साफ कपड़ा निकाला और बड़ी श्रद्धा से आगे बढ़ाया। उसकी आँखों में इतनी सच्चाई दिख रही थी कि गौरी देवी को उस पर शक करने का कोई कारण नहीं मिला।

एक पल के लिए उन्होंने झिझक महसूस की, लेकिन अगले ही पल उन्होंने अपने कुण्डल उतार दिए। उनके हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे। उन्होंने कुण्डल उस कपड़े में रख दिए, और युवक ने बड़ी सावधानी से उसे बाँध दिया।

“माँजी, आप यहीं बैठिए, हम अभी पानी लेकर आते हैं,” यह कहकर दोनों युवक वहाँ से चले गए।

गौरी देवी ने सिर हिलाया और उन्हें जाते हुए देखती रहीं। समय धीरे-धीरे बीतने लगा। पाँच मिनट, दस मिनट, फिर पंद्रह मिनट… लेकिन वे दोनों वापस नहीं आए।

अब गौरी देवी के मन में हल्की चिंता होने लगी। उन्होंने कपड़े को खोला, और जैसे ही उनकी नजर अंदर गई, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। कपड़ा खाली था।

उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। “हे भगवान… हम ठगाए गेलौं…” उनकी आवाज कांप रही थी।

आसपास के लोग इकट्ठा हो गए। किसी ने पानी दिया, किसी ने उन्हें सहारा दिया। लेकिन जो चला गया था, वह सिर्फ सोना नहीं था—वह भरोसा था, वह यादें थीं, वह भावनाएँ थीं।

कुछ लोगों ने उन्हें थाने पहुँचाया। वहाँ थाना प्रभारी अभिषेक झा ने उनकी पूरी बात सुनी। उन्होंने गंभीरता से सिर हिलाया और तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी।

सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए। कुछ ही घंटों में दोनों युवकों की तस्वीरें सामने आ गईं। पुलिस को पता चला कि यह कोई पहली घटना नहीं थी। ये लोग पहले भी कई जगहों पर इसी तरह की ठगी कर चुके थे।

जाँच आगे बढ़ी। मुखबिरों को सक्रिय किया गया। धीरे-धीरे सुराग मिलने लगे। कुछ दिनों बाद खबर आई कि ये दोनों मधुबनी की तरफ देखे गए हैं।

पुलिस टीम तुरंत वहाँ पहुँची। कई दिनों तक निगरानी रखने के बाद आखिरकार एक रात दोनों को पकड़ लिया गया।

पूछताछ में उन्होंने सब कुछ कबूल कर लिया। वे लोगों के भरोसे का फायदा उठाकर इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते थे। उनके पास से कई लोगों के गहने भी बरामद हुए।

कुछ दिनों बाद गौरी देवी को थाने बुलाया गया। जब उनके सामने उनके कुण्डल रखे गए, तो उनकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने काँपते हाथों से उन्हें उठाया और अपने कानों में पहन लिया।

“बेटा, भगवान तुम्हें खुश रखे,” उन्होंने अभिषेक झा से कहा।

गाँव लौटने के बाद गौरी देवी पहले जैसी नहीं रहीं। अब वे हर किसी से सतर्क रहती थीं। जब भी कोई उनसे मिलने आता, वे मुस्कुराकर एक ही बात कहतीं—“मीठी बात हर बार सच्ची नहीं होती।”

इस घटना ने पूरे गाँव को एक सबक दिया। लोग अब ज्यादा सतर्क हो गए थे। बुजुर्गों को खास तौर पर समझाया जाने लगा कि अनजान लोगों पर भरोसा न करें।

मिथिला की उस शांत धरती पर अब भी सुबह होती है, लोग मिलते हैं, बातें करते हैं, लेकिन अब उन बातों के पीछे एक सावधानी भी जुड़ गई है। क्योंकि एक बार टूटा हुआ भरोसा, फिर पहले जैसा नहीं बनता।

और गौरी देवी के कुण्डल… वे अब भी चमकते हैं, लेकिन उनकी चमक में अब एक चेतावनी भी छिपी है—कि हर मुस्कान के पीछे सच्चाई नहीं होती, और हर मीठी बात भरोसे के लायक नहीं होती।