#MNN24X7 कथा आरंभ

पूर्वांचल के एक छोटे से कस्बे—सीतागंज—में सुबह का सूरज जैसे ही मंदिर के शिखर पर पड़ता, घंटियों की आवाज़ पूरे इलाके को जगा देती थी। मंदिर के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे रोज़ की तरह पंडित हरिनारायण मिश्र अपनी चटाई बिछाकर बैठ जाते। माथे पर चंदन, हाथ में माला, और चेहरे पर अनुभव की झुर्रियों के साथ एक स्थिर संतुलन।

हरिनारायण मिश्र कोई साधारण पंडित नहीं थे। उनके पास सिर्फ मंत्रों का ज्ञान नहीं, बल्कि लोगों के जीवन की कहानियों का भी खजाना था। शादी से लेकर श्राद्ध तक, नामकरण से लेकर गृहप्रवेश तक—हर रस्म में उनका नाम लिया जाता था।

पर उस दिन उनके चेहरे पर हल्की खीझ थी।

“अब परोपकार का जमाना ही नहीं रहा,” उन्होंने अपने शिष्य दुर्गेश से कहा।

दुर्गेश, जो अभी कुछ साल पहले ही उनके पास सीखने आया था, चुपचाप सुन रहा था। उसने धीरे से पूछा—

“क्या हुआ गुरुजी?”

हरिनारायण ने एक लंबी सांस ली।

“जिस लड़के को मैंने अपने हाथ से पूजा-पाठ सिखाया, उसे मंदिर में लगवाया… आज वही मेरे यजमान तोड़ रहा है।”

दुर्गेश चौंक गया—“कौन? राघव?”

“हाँ वही,” हरिनारायण बोले, “मंदिर से जो कमाता है, सो अलग… अब मेरे दो पुराने यजमान भी अपने साथ ले गया।”

उनकी आवाज़ में दुख से ज्यादा चोट थी—विश्वास टूटने की।

दुर्गेश को यह सुनकर अचानक अपने पिता की कही एक पुरानी बात याद आई।

सीतागंज से लगभग 50 किलोमीटर दूर देवलपुर गाँव में उसके नाना रहते थे—पंडित गजानन शास्त्री।

गजानन शास्त्री अपने इलाके के बहुत बड़े पुरोहित माने जाते थे। उनकी यजमानी दूर-दूर तक फैली थी। एक बार उन्होंने अपने साथ एक युवा पंडित—रामलोचन तिवारी—को एक बड़े सेठ के अनुष्ठान में ले गए।

उस समय दुर्गेश के पिता ने गजानन शास्त्री से कहा था—

“बाबा, इस लड़के को मत ले जाइए। कहीं ऐसा न हो कि आपके यजमान छिन जाएं।”

गजानन शास्त्री हँस पड़े थे—

“तुम क्या समझते हो? तीस साल से ये हमारे यजमान हैं।”

लेकिन कहानी ने करवट ली।

अनुष्ठान खत्म होते-होते रामलोचन तिवारी ने उस सेठ परिवार के दिल में ऐसी जगह बना ली कि धीरे-धीरे पूरा परिवार उनके पास चला गया।

गजानन शास्त्री के हाथ से वह यजमानी निकल गई।

सीतागंज का राघव भी कुछ अलग नहीं था।

गरीब घर का लड़का, पढ़ाई में औसत, लेकिन बोलने में तेज़। हरिनारायण मिश्र ने उसे मंदिर में रख लिया था।

“सीख लेगा तो काम आएगा,” उन्होंने सोचा था।

शुरुआत में राघव बहुत विनम्र था। गुरुजी के पैर छूता, हर काम करता। लेकिन धीरे-धीरे उसने लोगों से सीधे संपर्क बनाना शुरू कर दिया।

किसी का मुहूर्त बताना, किसी का संकल्प लेना, किसी को घर जाकर पूजा करना—सब कुछ।

और फिर एक दिन खबर आई—राघव ने हरिनारायण के दो बड़े यजमानों के यहां पूजा कर दी।

“गुरुजी व्यस्त थे,” उसने सफाई दी।

लेकिन सच्चाई कुछ और थी।

सीतागंज के चौराहे पर एक दिन चर्चा चल रही थी।

रमेश यादव, जो चाय की दुकान चलाता था, बोला—

“भैया, आजकल तो जो मौका मिले, वही सही है। जाति-वाति सब पीछे रह गया है।”

पास बैठे नरेश पांडेय मुस्कुराए—

“सही कह रहे हो। देखो, हमारे मोहल्ले के शुक्ला जी का लड़का नगर निगम में सफाई कर्मचारी बन गया।”

रमेश ने हँसते हुए कहा—

“अरे ब्राह्मण होकर झाड़ू उठा लिया?”

नरेश ने गंभीर होकर कहा—

“भूख जाति नहीं देखती।”

देवलपुर में एक और कहानी जन्म ले रही थी।

वहां कुछ महापात्र ब्राह्मण परिवार रहते थे, जिनका मुख्य काम मृत्यु भोज और श्राद्ध था।

उनमें से एक युवक—शिवम झा—ने एक दिन ऐसा काम किया कि पूरे गाँव में हड़कंप मच गया।

वह सुबह-सुबह बैल लेकर खेत में उतर गया और हल चलाने लगा।

गाँव के बुजुर्ग चिल्लाने लगे—

“अरे ये क्या कर रहा है? ब्राह्मण होकर हल पकड़ लिया!”

किसी ने कहा—“अब अकाल पड़ेगा!”

लेकिन शिवम ने हल नहीं छोड़ा।

उसने कहा—

“अकाल तब पड़ता है जब आदमी मेहनत छोड़ देता है।”

उस दिन उसने सिर्फ खेत नहीं जोता, बल्कि परंपराओं की जड़ें भी हिला दीं।

सीतागंज में धीरे-धीरे बातें बदलने लगी थीं।

एक तरफ कुछ लोग कहते—

“ब्राह्मणों का समय गया।”

दूसरी तरफ कुछ कहते—

“अब भी सबसे ज्यादा सम्मान इन्हीं का है।”

हरिनारायण मिश्र इन सबको शांत होकर देखते थे।

एक दिन उन्होंने दुर्गेश से कहा—

“समय बदलता है, लेकिन मनुष्य की प्रवृत्ति नहीं बदलती।”

चुनाव का समय आया।

नेताओं की गाड़ियाँ गाँव में आने लगीं।

एक नेता ने सभा में कहा—

“हम ब्राह्मणों का सम्मान करेंगे।”

दूसरे ने कहा—

“हम सबको बराबरी देंगे।”

हरिनारायण मिश्र ने हँसते हुए कहा—

“सबको चाहिए वोट… कोई समाज नहीं।”

दुर्गेश को बचपन की फिल्में याद आईं।

फिल्मों और कहानियों का पंडित

कभी पंडित को मजाक का पात्र बनाया जाता था, कभी चालाक दिखाया जाता था।

वह सोचने लगा—

“क्या सच में समाज पंडित को ऐसे ही देखता है?”

हरिनारायण बोले—

“बेटा, जो समाज देखना चाहता है, वही दिखाया जाता है।”

एक दिन गाँव में एक शादी थी।

बारात आई, ढोल-नगाड़े बजे।

पंडित हरिनारायण मंत्र पढ़ रहे थे।

तभी एक शरारती युवक बोला—

“पंडित जी, जल्दी करिए… मुहूर्त निकल जाएगा!”

हरिनारायण मुस्कुराए—

“मुहूर्त नहीं निकलता बेटा, आदमी निकल जाता है।”

सब हँस पड़े।

राघव अब सफल हो चुका था।

उसके पास अपने यजमान थे, पैसे थे, पहचान थी।

लेकिन एक दिन वह मंदिर के बाहर बैठा था—अकेला।

दुर्गेश ने पूछा—

“क्या हुआ?”

राघव बोला—

“सब कुछ मिल गया… पर चैन नहीं है।”

“क्यों?”

“गुरुजी की नजर नहीं मिला पाता।”

कुछ साल बीत गए।

हरिनारायण मिश्र बूढ़े हो गए।

दुर्गेश अब खुद पूजा कराने लगा था।

एक दिन एक नया लड़का आया—

“गुरुजी, मुझे भी सीखना है।”

दुर्गेश ने उसकी तरफ देखा।

उसे राघव याद आया।

उसे अपने गुरु याद आए।

और उसने मुस्कुराकर कहा—

“ठीक है, सीखो।”

हरिनारायण मिश्र दूर से यह सब देख रहे थे।

उन्होंने धीरे से कहा—

“यही कालचक्र है…”

समय के साथ बहुत कुछ बदल गया।

शिवम झा अब सफल किसान बन चुका था।

राघव एक बड़ा पंडित बन गया था।

दुर्गेश अपने गुरु की परंपरा निभा रहा था।

और हरिनारायण मिश्र… अब सिर्फ एक स्मृति बन चुके थे।

लेकिन उनकी एक बात सबके दिल में रह गई—

“जाति नहीं, कर्म पहचान बनाता है… और अवसर हर किसी को बदल देता है।”

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यह कहानी समाज, अवसरवाद, परंपरा और बदलाव के उस चक्र को दिखाती है जो हर युग में चलता रहता है।