#MNN24X7 कथा आरंभ
दरभंगा और समस्तीपुर के बीच बसा वह छोटा-सा कस्बा—कुशेश्वरस्थान की ओर जाता रास्ता, चारों तरफ़ फैले धान के खेत, बीच-बीच में कच्ची पगडंडियाँ, और उन पगडंडियों पर चलते लोग—जिनकी ज़िंदगियाँ भी उन्हीं पगडंडियों की तरह टेढ़ी-मेढ़ी थीं। उसी कस्बे के चौक पर, एक पीपल के पेड़ के नीचे, टीन की छत और आधी दीवारों से बना एक सैलून था—“शिव शक्ति हेयर कटिंग सलून।”
दुकान का मालिक था—अशोक।
लोग उसे बस “अशोक” ही कहते थे। पर कुछ लोग मज़ाक में “अशोक उस्तरा” भी कहते, लेकिन कोई “जी” नहीं जोड़ता। “जी” जोड़ने की इज़्ज़त यहाँ आसानी से नहीं मिलती थी।
उस दिन दोपहर का वक्त था। धूप तपी हुई थी, लेकिन पीपल के पेड़ की छाँव में हल्की हवा चल रही थी। मैं, जो दरभंगा से आया हुआ एक पत्रकार था, गाँव की रिपोर्टिंग करते-करते थक गया था। बाल बढ़ गए थे, दाढ़ी भी बेतरतीब हो चुकी थी। मैंने सोचा—चलो, इसी सैलून में ठीक करवा लेते हैं।
जैसे ही मैं अंदर घुसा, एक पुरानी कुर्सी, एक धुँधला आईना, और सामने रखी लकड़ी की मेज़ पर बिखरे औज़ार—कैंची, उस्तरा, कंघी, और एक गंदा-सा तौलिया—सब कुछ मेरी नज़र में समा गया।
अशोक ने मुझे देखा और बोला—
“बैठ जाइए बाबू, अभी बनाते हैं।”
मैं कुर्सी पर बैठ गया। कुर्सी हल्की-सी डगमगाई। उसने पीछे से एक कपड़ा मेरे गले में लपेट दिया।
“बाल छोटा कर देंगे?” उसने पूछा।
“हाँ, और दाढ़ी भी सेट कर दीजिए,” मैंने कहा।
वह काम में लग गया। उसकी उँगलियाँ तेज़ थीं, लेकिन उनमें एक अजीब-सी थकान भी थी। जैसे हर कट के साथ वह सिर्फ बाल नहीं, अपनी ज़िंदगी के टुकड़े भी काट रहा हो।
मैंने पहली बार उसे गौर से देखा।
उसके चेहरे पर छोटे-छोटे काले धब्बे थे। जैसे धूप, धूल और वक्त ने मिलकर कोई स्थायी निशान बना दिया हो। आँखों के नीचे हल्की सूजन, माथे पर पसीने की बूँदें, और होंठों के कोने पर जमी गुटखे की लाली।
उसकी दाढ़ी—कुछ सफेद, कुछ काली—बिल्कुल वैसी ही जैसे गाँव के खेतों में पकते और कच्चे धान एक साथ दिखते हैं।
मैंने पूछा—
“कब से कर रहे हैं यह काम?”
वह मुस्कुराया—
“जब से होश संभाले हैं, तब से।”
“पढ़ाई नहीं की?”
“की थी बाबू… पाँचवीं तक। फिर बाप बीमार पड़ गए। दुकान संभालनी पड़ी।”
उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी। बस एक सीधी-सी सच्चाई थी।
उस्तरा चलाते हुए उसने मेरा चेहरा थोड़ा ऊपर उठाया। उसके मुँह से गुटखे और बीड़ी की मिली-जुली गंध आई। मुझे अजीब लगा, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा।
दुकान के बाहर से आवाज़ आई—
“अरे अशोक! जल्दी कर, बारात जाना है शाम में!”
अशोक ने जवाब दिया—
“हाँ रे भोला, आ रहा हूँ… पहले बाबू को निपटा लें।”
मैंने आईने में खुद को देखा। मेरे पीछे खड़ा अशोक, और उसके पीछे दीवार पर टंगा एक कैलेंडर—जिसमें देवी-देवताओं की तस्वीर थी, और नीचे लिखा था—“मिथिला ट्रांसपोर्ट कंपनी,।”
मैंने पूछा—
“बारात में भी जाते हो?”
“हाँ बाबू, यही तो असली कमाई है। शादी-ब्याह में ही कुछ पैसा बनता है। बाकी दिन तो बस जैसे-तैसे।”
“घर में कौन-कौन है?”
“माँ है, बीवी है, दो बच्चे हैं—एक बेटा, एक बेटी।”
“बेटी पढ़ती है?”
उसकी आँखों में एक हल्की चमक आई—
“हाँ, आठवीं में है। मास्टर साहब कहते हैं कि बहुत तेज है।”
“अच्छा है,” मैंने कहा।
वह थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला—
“बाबू, हम चाहते हैं कि वो पढ़-लिख जाए। हमारी तरह उस्तरा ना पकड़ना पड़े।”
उसके शब्दों में एक सपना था—छोटा, लेकिन बहुत मजबूत।
तभी एक बूढ़ा आदमी दुकान में आया—
“अशोक, जरा दाढ़ी बना दे।”
अशोक ने कहा—
“बैठ जाइए काका, अभी बाबू का काम खत्म कर देते हैं।”
बूढ़ा आदमी बेंच पर बैठ गया और मुझे देखने लगा। जैसे मैं कोई अलग दुनिया का आदमी हूँ।
अशोक फिर मेरे चेहरे पर झुक गया। उसके हाथ में उस्तरा था—तेज़, चमकता हुआ।
उस क्षण मुझे लगा—यह आदमी, जो रोज़ इतने चेहरों के इतना करीब आता है, कितनी ज़िंदगियाँ छूता होगा। कितनी कहानियाँ उसके सामने खुलती होंगी, और कितनी चुपचाप दफन हो जाती होंगी।
“डर तो नहीं लगता?” मैंने अचानक पूछा।
“किससे?”
“उस्तरे से… इतनी पास से चलाते हो।”
वह हँस पड़ा—
“बाबू, डर तो हमें रोज़ लगता है… लेकिन उस्तरे से नहीं… ज़िंदगी से।”
मैं चुप हो गया।
उसने दाढ़ी पूरी की, फिर एक गंदे-से तौलिये से मेरा चेहरा पोंछा। फिर सस्ता-सा आफ्टरशेव लगाया।
“हो गया बाबू,” उसने कहा।
मैंने आईने में खुद को देखा। सच में, मैं पहले से साफ और ठीक लग रहा था।
मैंने जेब से पचास रुपये निकाले और उसकी ओर बढ़ा दिए।
उसने पैसे लिए, और हल्की मुस्कान के साथ बोला—
“धन्यवाद बाबू।”
मैंने अचानक कहा—
“अशोक जी, अच्छा काम करते हैं आप।”
वह थोड़ा चौंका। शायद “जी” सुनने की आदत नहीं थी उसे।
लेकिन उसने बस सिर हिलाया—
“आप फिर आइएगा।”
मैं दुकान से बाहर निकला। धूप अब भी तेज थी, लेकिन मुझे कुछ अलग महसूस हो रहा था।
घर लौटकर जब मैं नहाकर बैठा और किताब खोलकर पढ़ने लगा, तो अचानक मेरे बाल गिरने लगे—किताब के पन्नों पर।
मैंने आईने में खुद को देखा—और जाने क्यों, मुझे अपने पीछे अशोक का चेहरा दिखाई दिया।
वही धब्बेदार चेहरा, वही थकी हुई आँखें, वही खिचड़ी दाढ़ी।
और उसकी आवाज़ जैसे मेरे कानों में गूँजने लगी—
“बाबू, फिर आइएगा…”
मैंने किताब बंद कर दी।
मेरे मन में अचानक एक सवाल उठा—
हम कितनी आसानी से लोगों को देखे बिना देख लेते हैं?
कितनी बार हम किसी नाई, रिक्शावाले, मजदूर को सिर्फ उनके काम से पहचानते हैं—उनकी ज़िंदगी से नहीं।
अशोक सिर्फ एक सैलून वाला नहीं था।
वह एक बाप था, एक बेटा था, एक पति था—और सबसे बढ़कर, एक सपना देखने वाला इंसान था।
मिथिला की उस मिट्टी में, जहाँ हर घर में संघर्ष की कहानी लिखी जाती है, अशोक भी अपनी कहानी लिख रहा था—उस्तरे की धार पर।
और मैं सोच रहा था—
शायद अगली बार जब मैं किसी सैलून में जाऊँगा, तो सिर्फ बाल नहीं कटवाऊँगा…
बल्कि एक इंसान को देखने की कोशिश करूँगा।
क्योंकि कभी-कभी, सबसे सच्ची कहानियाँ वहीं मिलती हैं—
जहाँ हम देखने की ज़हमत नहीं उठाते।

आशुतोष कुमार झा
