#MNN24X7 कथा आरंभ
दरभंगा जिले के एक छोटे से गाँव—सिंहवाड़ा प्रखंड के अंतर्गत पड़ने वाला वह सरकारी मध्य विद्यालय—जहाँ दीवारों का रंग उखड़ चुका था, खिड़कियों की सलाखों पर जंग जम चुका था, और बरामदे में पड़ी टूटी बेंचें जैसे हर दिन शिक्षा की जद्दोजहद की कहानी सुनाती थीं।
सुबह का समय था। धूप अभी हल्की थी, लेकिन गर्मी की शुरुआत हो चुकी थी। स्कूल के मैदान में कुछ बच्चे नंगे पैर दौड़ रहे थे, कुछ मिड-डे मील के बर्तन धो रहे थे, और कुछ अपनी कॉपी-किताब लेकर पेड़ के नीचे बैठकर रट रहे थे।
उसी स्कूल में पढ़ाते थे—मिथिलेश झा सर।
गाँव में सब उन्हें “मिथिलेश मास्टर” कहते थे। उम्र लगभग चालीस के आसपास, चेहरे पर हल्की दाढ़ी, आँखों में थकान लेकिन भीतर कहीं एक जिद—कुछ बदलने की।
उस दिन भी वे रोज़ की तरह साइकिल से स्कूल पहुँचे। साइकिल की घंटी बजाते हुए जब वे गेट के अंदर आए, तो चौकीदार ने हाथ जोड़कर कहा—
“प्रणाम मास्टर साहेब।”
“प्रणाम,” उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया।
उन्होंने अपनी पुरानी बैग कंधे से उतारी और स्टाफ रूम में रख दी। स्टाफ रूम में एक पुरानी टेबल, दो कुर्सियाँ, और कोने में रखा पानी का एक मटका—जिसमें अक्सर पानी खत्म ही रहता था।
उन्होंने मटके को देखा—खाली।
हल्की मुस्कान आई उनके चेहरे पर—
“आज फिर बिना पानी के ही काम चलाना पड़ेगा…”
लेकिन ये कोई नई बात नहीं थी।
घंटी बजी। बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में चले गए।
मिथिलेश सर कक्षा 8 में गए। आज हिंदी का पीरियड था।
“सब लोग बैठ जाओ,” उन्होंने कहा।
बच्चे एक साथ बोले—
“गुड मॉर्निंग सर!”
“गुड मॉर्निंग,” उन्होंने जवाब दिया।
उन्होंने किताब खोली और पढ़ाना शुरू किया।
आज का पाठ था—“मानवता और संवेदना।”
वो पढ़ाते-पढ़ाते खुद भी उस पाठ में डूब गए।
“बच्चों, इंसान वही है जिसमें दूसरों के लिए संवेदना हो… जो दूसरों का दर्द समझ सके…”
बच्चे सुन रहे थे। कुछ समझ रहे थे, कुछ बस देख रहे थे।
कक्षा के पीछे एक लड़का बैठा था—नाम था “छोटू” (असल नाम शिवनंदन था, लेकिन सब उसे छोटू ही कहते थे)। दुबला-पतला, काले रंग का, हमेशा चुप रहने वाला।
वो ज़्यादा बोलता नहीं था।
ना सवाल करता, ना जवाब देता।
बस चुपचाप बैठकर सब देखता रहता।
मिथिलेश सर पढ़ाते जा रहे थे…
लेकिन आज उनकी आवाज़ धीरे-धीरे बैठने लगी थी।
सुबह से ही गला सूख रहा था।
घर से निकलते वक्त पानी पीना भूल गए थे।
उन्होंने एक पल के लिए सोचा—
“थोड़ा रुक जाऊँ…”
लेकिन फिर खुद ही मन को समझाया—
“नहीं… बच्चों के सामने कमजोरी नहीं दिखानी चाहिए…”
और वे पढ़ाते रहे।
“मानवता का सबसे बड़ा उदाहरण क्या है? जब हम बिना किसी स्वार्थ के किसी की मदद करें…”
अब उनकी आवाज़ और धीमी हो गई थी।
गला सूख चुका था।
उन्होंने एक बार फिर मटके की तरफ देखा—जो कक्षा के कोने में रखा था।
लेकिन उसमें भी पानी नहीं था।
कक्षा में सन्नाटा था।
तभी पीछे से एक हल्की सी आवाज़ आई—
“सर…”
मिथिलेश सर ने मुड़कर देखा।
वही छोटू खड़ा था।
उसने अपने बैग से एक प्लास्टिक की बोतल निकाली—थोड़ी पुरानी, किनारों से घिसी हुई।
“सर… पानी पी लीजिए…”
पूरा क्लास उस तरफ देखने लगा।
मिथिलेश सर कुछ सेकंड के लिए चुप रह गए।
उनकी आँखें उस बोतल पर टिक गईं।
फिर उन्होंने छोटू की तरफ देखा।
उसकी आँखों में कोई झिझक नहीं थी… बस एक सच्चाई थी।
वो पल बहुत छोटा था…
लेकिन उसमें बहुत कुछ बदल गया।
मिथिलेश सर धीरे-धीरे आगे बढ़े…
और बोतल अपने हाथ में ली।
उनकी उँगलियाँ हल्की-सी कांप रही थीं।
उन्होंने एक घूंट पानी पिया।
पानी साधारण था—ना ठंडा, ना साफ़-सुथरे फिल्टर का…
लेकिन उस घूंट में जो सुकून था—वो किसी भी महंगे मिनरल वाटर में नहीं हो सकता था।
उन्होंने बोतल वापस करते हुए कहा—
“धन्यवाद…”
छोटू बस मुस्कुरा दिया… और बैठ गया।
कक्षा फिर शुरू हो गई…
लेकिन अब पढ़ाई कुछ अलग हो चुकी थी।
मिथिलेश सर की आँखों में हल्की नमी थी।
उन्होंने किताब बंद कर दी।
“बच्चों,” उन्होंने कहा—
“आज जो हुआ… वही असली पाठ है…”
सब बच्चे चुप थे।
“हम सोचते हैं कि हम तुम्हें पढ़ा रहे हैं… लेकिन सच ये है कि तुम लोग हमें भी बहुत कुछ सिखाते हो…”
उन्होंने छोटू की तरफ देखा—
“आज इसने मुझे सिखाया है—मानवता क्या होती है…”
पूरा क्लास तालियाँ बजाने लगा।
छोटू झेंप गया…
उसने सिर नीचे कर लिया।
पीरियड खत्म हुआ।
घंटी बजी।
बच्चे बाहर चले गए।
मिथिलेश सर स्टाफ रूम में आए।
कुर्सी पर बैठ गए।
आज उनका मन पढ़ाने में नहीं लग रहा था।
वो बस सोच रहे थे…
“मैं इतने सालों से पढ़ा रहा हूँ… लेकिन आज पहली बार लगा कि मेरी मेहनत कहीं पहुँच रही है…”
उन्हें अपना बचपन याद आ गया।
वो भी ऐसे ही एक सरकारी स्कूल में पढ़ते थे।
फटे कपड़े, बिना चप्पल, और भूखे पेट।
एक दिन उनके शिक्षक ने उन्हें अपनी टिफिन से खाना खिलाया था।
तब उन्होंने सोचा था—
“एक दिन मैं भी टीचर बनूँगा…”
आज इतने साल बाद…
उन्हें लगा—वो सपना कहीं सच हो रहा है।
शाम को स्कूल खत्म हुआ।
मिथिलेश सर साइकिल लेकर घर लौट रहे थे।
रास्ते में खेत, पोखर, और मिट्टी की खुशबू।
लेकिन आज हर चीज़ कुछ अलग लग रही थी।
उन्हें बार-बार वही पल याद आ रहा था—
छोटू का “सर… पानी पी लीजिए…”
घर पहुँचकर उन्होंने हाथ-मुँह धोया, और चारपाई पर बैठ गए।
पत्नी ने पूछा—
“आज कुछ परेशान लग रहे हैं?”
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“नहीं… आज तो बहुत अच्छा दिन था…”
फिर उन्होंने पूरी घटना बताई।
पत्नी ने चुपचाप सुना… और फिर कहा—
“देखिए, यही असली कमाई है आपकी…”
मिथिलेश सर ने सिर हिलाया।
रात को जब वो सोने गए, तो नींद जल्दी नहीं आई।
वो सोच रहे थे—
“कितने छोटे-छोटे पल होते हैं… जो ज़िंदगी बदल देते हैं…”
अगले दिन जब वो स्कूल पहुँचे, तो छोटू पहले से ही वहाँ बैठा था।
मिथिलेश सर उसके पास गए—
“छोटू…”
वो खड़ा हो गया—
“जी सर…”
“तुम बड़े अच्छे हो…”
छोटू कुछ नहीं बोला… बस हल्की मुस्कान दी।
उस दिन के बाद…
मिथिलेश सर ने पढ़ाने का तरीका बदल दिया।
अब वो सिर्फ किताब नहीं पढ़ाते थे—
बल्कि बच्चों की ज़िंदगी भी समझने लगे।
किसके घर में क्या परेशानी है…
कौन भूखा आता है…
कौन चुप रहता है…
सब पर ध्यान देने लगे।
और धीरे-धीरे…
वो स्कूल बदलने लगा।
बच्चे सिर्फ पढ़ने नहीं आते थे—
बल्कि सीखने आते थे।
और मिथिलेश सर…
अब सिर्फ टीचर नहीं थे—
बल्कि एक मार्गदर्शक बन चुके थे।
सालों बाद…
जब छोटू बड़ा हुआ…
तो वही स्कूल में टीचर बनकर लौटा।
पहले दिन उसने स्टाफ रूम में जाकर मटका भरा…
और एक नई बोतल रख दी।
मिथिलेश सर ने पूछा—
“ये सब क्यों?”
छोटू मुस्कुराया—
“सर… कहीं किसी को प्यास लगे… तो उसे इंतज़ार ना करना पड़े…”
मिथिलेश सर की आँखें भर आईं।
उन्हें समझ आ गया—
उस दिन जो पानी का एक घूंट उन्होंने पिया था…
वो सिर्फ पानी नहीं था…
वो एक बीज था—
जो अब एक पेड़ बन चुका था।
और उस पेड़ की छाँव में…
अब कई ज़िंदगियाँ ठंडी हवा महसूस कर रही थीं।

आशुतोष कुमार झा
