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“अदालत में गवाही सबूतों से होती है, लेकिन समाज की अदालत में अफवाहें भी फैसले लिख देती हैं।”

सावन बीत चुका था।

कमलपुर गाँव में धान की बालियाँ झूम रही थीं। खेतों में हवा चलती तो हरियाली समुद्र की लहरों जैसी लगती। गाँव के लोग अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त थे, लेकिन एक घर ऐसा भी था जहाँ समय जैसे ठहर गया था।

वह था जगदीश झा का घर।

अब उस घर की पहचान खेत, गाय या तुलसी चौरा से नहीं, बल्कि एक वाक्य से होने लगी थी—

“यही है उस लड़के का घर, जिस पर हत्या का मुकदमा चल रहा है।”

निरंजन जब घर से निकलता, उसे लगता जैसे हर नज़र उसके चेहरे पर नहीं, उसके मुकदमे पर टिकी है।

गाँव की सबसे बड़ी अदालत पंचायत भवन नहीं, बल्कि हरिनारायण की चाय की दुकान थी।

वहीं फैसले होते थे।

वहीं चरित्र लिखे जाते थे।

वहीं इज़्ज़त बनती और बिगड़ती थी।

एक सुबह निरंजन चुपचाप चाय पीने बैठा था।

पास बैठे एक आदमी ने धीरे से कहा—

“देखलियै… ईहे छै।”

दूसरा बोला—

“चेहरा तऽ भोला छै… लेकिन आदमी के पहचान चेहरा सँ कहाँ होइत छै।”

निरंजन ने सब सुन लिया।

उसने चाय अधूरी छोड़ दी।

हरिनारायण ने पीछे से आवाज़ दी—

“बाबू, चाय तऽ पी लिअ।”

निरंजन मुस्कराया।

“काका… चाय ठंडा नै भेल छै… हमर मन ठंडा पड़ि गेल छै।”

और वह चला गया।

इसी बीच गाँव के प्रतिष्ठित शिक्षक शिवनाथ मिश्र एक दिन जगदीश झा के घर आए।

उन्होंने धीरे से कहा—

“एक बात कहूँ… बुरा मत मानिए।”

“कहिए।”

“मेरी भतीजी है… पढ़ी-लिखी लड़की… मुझे निरंजन पसंद है।”

जगदीश झा की आँखों में वर्षों बाद चमक लौटी।

लेकिन शिवनाथ मिश्र आगे बोले—

“मैं तैयार हूँ… पर घर वाले एक ही सवाल पूछते हैं—’अगर कल सज़ा हो गई तो बेटी का क्या होगा?'”

आँगन में सन्नाटा छा गया।

जगदीश झा के पास कोई जवाब नहीं था।

माँ की चिट्ठी

सीता देवी पढ़ी-लिखी नहीं थीं।

एक दिन उन्होंने गाँव के मास्टरजी से कहा—

“हमरा बेटा के नाम एक चिट्ठी लिखि दियौ।”

मास्टरजी ने कागज़ निकाला।

सीता देवी बोलती गईं—

> “बेटा,
तू चिंता मत कर।
हम सब ठीक छी।
तोहर बाबूजी दिन-रात तोरा खातिर दौड़ैत छथि।
भगवान पर भरोसा राख।
झूठ कतेको दिन टिकत, सच एक दिन जरूर जीतत।

घर जल्दी आबिहऽ।
तोहर माय।”

मास्टरजी लिखते-लिखते रुक गए।

उनकी आँखें भीग गई थीं।

अदालत में हर तारीख़ पर एक बुज़ुर्ग आदमी निरंजन को देखता था।

एक दिन उन्होंने पास आकर पूछा—

“बेटा, कितने साल से केस चल रहा है?”

“तीन साल।”

बूढ़ा आदमी हल्का-सा हँसा।

“मेरा पंद्रह साल हो गया।”

निरंजन चौंक गया।

“फैसला नहीं आया?”

“अभी गवाह बाकी हैं।”

कुछ देर बाद वह बूढ़ा बोला—

“एक बात याद रखना… अदालत इंसान से पहले उसका धैर्य परखती है।”

उस दिन निरंजन पहली बार समझा कि वह अकेला नहीं है।

अदालत के बरामदे में ऐसे सैकड़ों लोग थे, जो अपने-अपने मुकदमों के साथ बूढ़े हो रहे थे।

बहन मंजरी का रिश्ता बार-बार टूट रहा था।

आख़िरकार दूर के एक गाँव से रिश्ता तय हुआ।

लड़के वालों ने एक शर्त रखी—

“शादी बिल्कुल सादगी से होगी। मुकदमे की बात किसी को पता नहीं चलनी चाहिए।”

शादी के दिन निरंजन घर के भीतर ही रहा।

उसने बहन की डोली को खिड़की से जाते देखा।

मंजरी ने भी एक बार पलटकर देखा।

दोनों की नज़रें मिलीं।

बहन मुस्कराने की कोशिश कर रही थी।

भाई रोने की।

उस दिन निरंजन को पहली बार लगा कि वह अपने ही घर में मेहमान बन गया है।

कुछ दिनों बाद गाँव के मंदिर में भंडारा था।

निरंजन भी प्रसाद लेने पहुँचा।

एक आदमी ने ऊँची आवाज़ में कहा—

“पहले अपराधी को प्रसाद मिलेगा क्या?”

मंदिर में सन्नाटा छा गया।

तभी पुजारी रामलोचन बाबा आगे आए।

उन्होंने प्रसाद की थाली निरंजन के हाथ में रख दी।

फिर सबकी ओर देखकर बोले—

“अदालत ने अभी इसे अपराधी नहीं कहा है। तुम लोग भगवान से भी बड़े न्यायाधीश कब बन गए?”

कोई कुछ नहीं बोला।

उस दिन पहली बार गाँव में किसी ने खुलेआम निरंजन का साथ दिया।

मुकदमे का चौथा साल था।

जगदीश झा अब पहले जैसे मजबूत नहीं रहे।

दिन में खेत…

रात में मुकदमे की फाइलें…

कभी वकील…

कभी गवाह…

कभी कर्ज़…

एक शाम हल चलाते-चलाते वे खेत में गिर पड़े।

डॉक्टर ने कहा—

“ज़्यादा मेहनत मत कीजिए।”

उन्होंने मुस्कराकर जवाब दिया—

“गरीब आदमी मेहनत छोड़ देगा तो साँस कैसे चलेगी, डॉक्टर बाबू?”

उस रात निरंजन बहुत देर तक जागता रहा।

उसने पिता के फटे हाथ देखे।

माँ के सफेद होते बाल देखे।

घर की टूटी दीवार देखी।

और मन ही मन एक निर्णय लिया—

“अब मैं रोऊँगा नहीं।”

“अगर यह मुकदमा मेरी ज़िंदगी है, तो मैं इसे झेलूँगा। लेकिन अपने परिवार को टूटने नहीं दूँगा।”

उसी रात उसने पुरानी डायरी के पहले पन्ने पर एक पंक्ति लिखी—

> “मैं अदालत में अपना सच साबित करूँगा, लेकिन उससे पहले अपने परिवार का हौसला नहीं टूटने दूँगा।”

उस रात कमलपुर में तेज़ बारिश हुई।

तुलसी चौरा के पास रखा मिट्टी का दिया बुझ गया।

सीता देवी बाहर आईं।

उन्होंने फिर से दिया जलाया।

निरंजन उन्हें देखता रहा।

माँ मुस्कराकर बोलीं—

“बेटा… दीपक बुझ जाए तऽ फेर जलाई लेल जाइ छै। उम्मीद बुझ जाए, तऽ जिंदगी अन्हार भऽ जाइ छै।”

निरंजन ने पहली बार महसूस किया…

उसकी सबसे बड़ी वकील अदालत में नहीं,

उसकी माँ थी।

चैप्टर–4 समाप्त

अगले अध्याय में आप पढ़ेंगे की कैसे “सिंदूर और सज़ा के बीच” में निरंजन के जीवन में प्रेम का प्रवेश होता है। क्या एक ऐसी युवती उससे विवाह का निर्णय लेगी, जिसे पता होगा कि उसके होने वाले पति पर हत्या का मुकदमा चल रहा है?