#MNN24X7 कथा प्रारंभ
राघोपुर में भोरका समय…
हल्लुक रौद, चाह’क चुस्की आ गली-गली में एकही सवाल—
“गैस बुक करेलियै?”
राघोपुर के वार्ड नंबर 12 में रह वाली मालती देवी भोरे-भोर आँगन में बैसल बस चूल्हा के दुलार क रहल छलीह, मानू की जेना ओ कोनो पुरना संगी हो। गैस के सिलेंडर कोन में पूरा भरल राखल छल… मुदा तैयो हुनकर आँखि में चिंता छल।
ओम्हर कोनटा सं हुनकर पड़ोसिन फुलमती काकी पुछलखिन— “की यै कनियां, सिलेंडर खाली भ गेल की?”
मालती देवी धीरे सं बाजलीह— “नय काकी… लेकिन सुनैत छी जे जुद्ध भ रहल अछि… गैस खत्म भ गेल त?”
बच्चा कक्का कहलनि अब पछताये होत क्या।
चुल्हा के घुआँ जकरा परेशानी बुझैत छलै,
चिपरी ठोकनाय जखरा पहाड़ लागैत छल।
ओकरा गैस समस्या बुझैत छै। सुनियो के आश्चर्य लगैत अछि।
ओ आगू कहलनि – जे व्यक्ति दोसर के हाथ में अप्पन गरदनि राखैत अछि ओकर एहने हाल होइत अछि।
बस… यैह एकटा वाक्य छल जेऽ पूरा राघोपुर में महाभारत शुरू कऽ देने छल।
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दुपहरिया तक ई खबरि बन गेल—
“सीमा पर तनाव बढ़ि रहल छै … गैस एनाय बंद भऽ जैत!”
आ सांझ तक— वैह खबरि कीछु और बनि गेल।
“बच्चा कक्का कहलनि —जतेक भऽ सके गैस जमा कऽ लिय!”
आब ई गप्प के कहलक, कखन कहलख, किया कहलक, ककरा कहलक वा कहबो केलक की नहि —एकर केयो गवाह नहि छल…
मुदा आब हरेक मोबाइल में, हरेक व्हाट्सएप ग्रुप पर, हरेक दलान आ चाहक दोकान पर यैह चर्चा।
पप्पू चाहवाला त मानू अपने विदेश मंत्री बनि गेल छल— ओ चिंतक जेका सोचैत बाजल “हमरा अंदर के खबरि अछि… तीन दिन में गैस खत्म!”
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अगिला दिन भोर…
गैस एजेंसी के बाहर नमहर लाइन…
एतेक नमहर कि लागि रहल छल मानू धुरंधर 2सिनेमा कऽ टिकट फ्री में बंटि रहल हो।
गैस डिलीवरी बला—रामबाबू पसीना पोंछते बाजल— “अरे भौजी! अहाँ के घर में तऽ दू-दू टा सिलेंडर छै… फेरो किया?”
मालती देवी बाजलीह — “एकटा राखब, एकटा बचत में… जुद्ध कहियो तक भऽ सकैत छै!”
पाछू सं बबलू जी चिचियेला— “हमरा तीनटा बुक कऽ दिय… एकटा अपने, एकटा सासुर आ एकटा बाॅस के नाम पर!”
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सांझ के मोहल्ले में “ज्ञानी मंडल” के बैसार भेल।
प्रोफेसर झा कहलैथ— “देखू, इतिहास गवाह अछि—जखन-जखन युद्ध भेल छै, संसाधन खत्म भऽ गेल छै!”
मास्टर साहेब बजलथि— “हम त कहै छी, गैस छोड़ू… लकड़ी जमा करू!”
आ गुड्डू इंजीनियर, जे एखने तुरंत यूट्यूब देखि केऽ आयल छलाह, बजलथि— “इंडक्शन ल लऽलिय… गैस खत्म भ जै त?” कहिया तक एकर चक्कर मे रहब।
बस… अगिल दिन सं इंडक्शन, एयर फ्रायर, हीटर—सबहक लोकल दुकान खाली!
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वैह भीड़ में एकटा बूढ़ महिला सरस्वती काकी ठाढ़ छलीह—
हुनका घर में सत्ते में गैस खत्म भऽ गेल छल।
ओ ठाढ़ लोक सबसं धीरे सं कहलनि — “बाबू, हमरा घर में चूल्हा बंद छै… एकटा सिलेंडर हमरो दिया दियौ…”
मुदा भीड़ में हुनकर आवाज के सुनबला,
स्वार्थी मनुक्ख जकरा बस अपने समस्या टा देखबा में आबैत छै।
किया की हरेक व्यक्ति बस अप्पन “भविष्य” बचाब में लागल छल…
मुदा किनको “आजुक” चिंता नहीं छल।
जे समाजऽक एकटा वृद्ध महिला के की व्यथा अछि।
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तीन दिनक बाद…
खबर ऐल—
“दू टा गैसऽक जहाज भारत पहुँच गेल अछि !”
बस… इतबे सुनैत राघोपुर के माहौल बदलि गेल।
जे व्यक्ति कैल तक तीन-तीनटा सिलेंडर नुका के रखने छलाह, ओहो आई कहि रहल छलाह जे— “अरे, हमरा त जरूरते नय छै… राखल-राखल खराब भऽ जाएत!”
आब गैस एजेंसी के बाहर सन्नाटा पसरल छल…
किया की आब गै होम डिलीवरी हैत।
ई सब देखि कऽ रामबाबू मुस्कियैत बजलाह— “देखलियै भौजी… डरऽक खेल!”
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मालती देवी चूल्हा पर रोटी सेंकैत बजलीह— “सत कहैत छी… गैस सं बेसी डर खत्म होई क छल!”
ओम्हर सरस्वती काकी के सेहो आखिरकार सिलेंडर भेट गेलैन्ह…
मुदा ओ एकटा गप्प कहलनि —
“अहाँ सब सांढऽक सींघ सं नय डराईत छी…
लेकिन डर से मरि जरूर सकैत छी…”
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अआब राघोपुर में ऐहि दिन से एकटा नबका नियम बनल—
“जरूरत से बेसी राख बला सबहक, नाम लिखि के राखल जाय लागल। पुरस्कारक लेल नहि बस
पुलिस के सूचना देबाक लेल।
किया की एहेन स्वार्थी मनुक्ख कतौ रहे
सामाजक के ओकरा सं कोनो लाभ नहि।
आ पप्पू चायवाला…?
ओकरा काजेक आब एतबे छल
ताहि कारणें ओ आब एकटा नबका
खबरि पसारऽ में लागल छल—
“सुने छीयै… आब पैनऽक किल्लत होए बला छै!”

(सर्वाधिकार सुरक्षित -लेखक – आशुतोष कुमार झा)