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MNN@24X7 आश्विन मासक कृष्ण पक्षक अष्टमी तिथिकेँ जिवित्पुत्रिका अष्टमी कहल जाइछ । एहि अष्टमी तिथिमे पुत्र-सौभाग्य प्राप्तिक कामनासँ स्त्री बहुत श्रद्धा एवं तत्परतासँ व्रत आ जीमूतवाहनक पूजा अर्चना करैत छथि। ई व्रत सम्पूर्ण अष्टमी तिथिमे होइत अछि आ अष्टमीक अंत भेलापर नवमीमे पारण होइछ। भविष्य पुराणमें एहि अष्टमी तिथिमे अन्न जल ग्रहण करब निषेध कहल गेल अछि।

एहि वर्ष ई व्रत सम्पूर्ण मिथिलामे 17 सितम्बर शनिसँ शुरू भ’ 18 सितम्बर रविकेँ अपराह्न 4:49 तक रहत तकरबाद पारण होयत मुदा वनारस पंचांगमे ई व्रत 18 सितम्बर रविकेँ करबाक निर्णय देल गेल अछि,कारण जे ओ उदयव्यापिनी अष्टमीकेँ आधार मानलनि अछि। एहि दुविधाकेँ दूर करबाक लेल आउ निम्न तथ्यपर विचार करैत छी-:

मिथिलामे ई व्रत प्रदोषव्यापिनी अष्टमीमे करबाक मान्यता अछि जकरा विभिन्न आर्षग्रंथ सेहो प्रतिपादित केलनि अछि।

भविष्यपुराणमे स्पष्ट उल्लेख अछि जे –

इयं अष्टमी प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या।
प्रदोष समये स्त्रीभिः पूज्यो जीमूतवाहनः।
पुष्करिणीं विधायाथ प्रांगणे चतुरस्रिकाम्।।

अर्थात – ई अष्टमी प्रदोषव्यापिनीमे ग्राह्य अछि, कारण जे एहि व्रतक प्रमुख देवता श्री जीमूतवाहनक पूजा
प्रदोष कालहिमे करबाक विधान अछि।

विष्णु धर्मोत्तर ग्रंथमे सेहो ई प्रतिपादित कएल गेल अछि –

पूर्वेद्युरपरेद्युर्वा प्रदोषे यत्र चाष्टमी।
तत्र पूज्यः सदा स्त्रीभिः राजा जीमूतवाहनः।।

स्पष्ट अछि जे-: पूर्व दिन वा पर (अगिला) दिन, प्रदोष कालमे जाहि दिन अष्टमी रहत ओहि दिन स्त्री सभक द्वारा व्रत पूर्वक प्रदोष कालहिमे जीमूतवाहनक पूजा करबाक चाही।
तहिना तिथि चंद्रिका मे सेहो म. म. पक्षधर मिश्रक वचन द्रष्टव्य अछि – सप्तम्यामुदिते सूर्ये परतश्चाष्टमी भवेत्।
तत्र व्रतोत्सवं कुर्यात् न कुर्यादपरेऽहनि।

एत्तहु स्पष्ट अछि जे यदि सूर्योदयक समय सप्तमी होइ आ अगिला दिन अष्टमी होइ त’ सप्तमीक दिन व्रत उत्सव पूर्वक करबाक चाही नहि कि अगिला दिन उदया अष्टमीमे। एहने वचन तिथि तत्त्व चिंतामणि में सेहो आयल अछि। म. म. महेश ठक्कुर सेहो एही वचनकेँ प्रतिपादित करैत छथि जे-: जाहि दिन प्रदोष कालमे अष्टमी तिथि होइ ओहि दिन ई व्रत करबाक चाही। यदि दुनू दिन प्रदोष कालमे अष्टमी तिथि होइ तखनो सप्तमी युक्त अष्टमी अर्थात पूर्व दिनेमे ई व्रत करबाक चाही।
म. म. अमृतनाथ झा केर कृत्यसार समुच्चयक पृष्ठ संख्या 19 मे सेहो एहि सभटा आर्ष वचनकेँ समाहित क’ पूर्व दिनक प्रदोषव्यापिनी अष्टमीकेँ प्रतिपादित कएल गेल अछि।
एहि व्रतक सभसँ महत्वपूर्ण बात ई अछि जे कि आश्विन कृष्ण पक्षक एहि अष्टमी तिथिमे अन्न जल ग्रहण करब एकदम वर्जित छै –

आश्विनस्यासिताष्टम्यां याः स्त्रियोऽन्नञ्च भुञ्जते। मृतवत्सा भवेयुस्ता विधवा दुर्भगा ध्रुवम्।।

अर्थात आश्विन मासक कृष्ण पक्षक अष्टमी तिथिमे जे स्त्री अन्न ग्रहण करैत छथि ओ मृतवत्सा और विधवा सन दुर्भाग्यकेँ प्राप्त होइत छथि। अस्तु!

उपर्युक्त सभटा तथ्य आ आर्ष वचनकेँ देखलासँ स्पष्ट होइत अछि जे एहि वर्ष जीमूतवाहनक ई व्रत 17 सितम्बर (शनिकेँ सूर्योदय से प्रारंभ भ’ क’ 18 सितम्बर (रवि) अपराह्न 4:49 तक रहत आ अपराह्न 4:49क बाद पारण होयत। योह समुचित आ शास्त्रसम्मत निर्णय अछि।

लेखक-:
देवानन्द मिश्र
सहायक शिक्षक
शारदा भवन संस्कृतोच्च विद्यालय नवानी मधुबनी
(मिथिला)