“कुछ लोगों की उम्र वर्षों में नहीं, अदालत की तारीख़ों में मापी जाती है।”अब आगे की कहानी
करीब तीन महीने बाद निरंजन को ज़मानत मिल गई।
जेल का भारी फाटक खुला।
उसने बाहर कदम रखा।
धूप वही थी…
हवा वही थी…
लेकिन दुनिया बदल चुकी थी।
बाहर जगदीश झा खड़े थे। उनकी दाढ़ी पहले से अधिक सफेद लग रही थी। आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे। तीन महीने में जैसे वे दस साल बूढ़े हो गए थे।
उन्होंने बेटे को गले लगाया।
दोनों रोए नहीं।
कभी-कभी दुख इतना बड़ा होता है कि आँसू भी उसका बोझ नहीं उठा पाते।
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जब निरंजन कमलपुर पहुँचा, तो पूरे गाँव की निगाहें उसी पर टिक गईं।
कुछ लोगों ने कहा—
“भगवान की कृपा से बेटा लौट आया।”
कुछ ने धीरे से फुसफुसाया—
“जमानत मिली है… बरी नहीं हुआ है।”
यही एक वाक्य उसके पीछे-पीछे चलने लगा।
वह कुएँ पर जाता तो बातें बंद हो जातीं।
चाय की दुकान पर बैठता तो लोग विषय बदल देते।
पहले जिसे “निरंजन बाबू” कहा जाता था, अब लोग कहते—
“वही… हत्या वाला लड़का।”
उसने पहली बार समझा कि अदालत की ज़मानत मिल सकती है, लेकिन समाज की ज़मानत बहुत मुश्किल होती है।
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एक महीने बाद फिर अदालत जाना था।
सुबह चार बजे पिता-पुत्र उठ गए।
माँ ने चुपचाप रोटी और आलू की सूखी सब्ज़ी बाँध दी।
जाते समय सीता देवी ने बेटे के माथे पर हाथ रखा।
“जल्दी लौटिहऽ बेटा… भगवान सब ठीक करताह।”
दरभंगा की बस खचाखच भरी थी।
अदालत पहुँचे।
वकील से मिले।
घंटों इंतज़ार किया।
दोपहर हुई।
फिर शाम।
अंत में अदालत के बाबू ने पुकारा—
“अगली तारीख़…”
बस।
पूरे दिन का यही परिणाम था।
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धीरे-धीरे यह एक आदत बन गई।
हर दो महीने…
हर तीन महीने…
एक नई तारीख़।
एक नई उम्मीद।
एक नया इंतज़ार।
घर की दीवार पर लगा कैलेंडर अब त्योहारों के लिए नहीं, अदालत की तारीख़ों के लिए इस्तेमाल होने लगा।
सीता देवी लाल पेंसिल से हर सुनवाई का दिन घेर देतीं।
फिर उसके ऊपर लिख देतीं—
“भगवान कृपा करिहें।”
लेकिन हर बार लौटते समय निरंजन के हाथ में सिर्फ अगली तारीख़ होती।
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वकील की फीस…
बस का किराया…
कागज़ों का खर्च…
गवाहों को बुलाने का खर्च…
धीरे-धीरे पैसे खत्म होने लगे।
एक दिन जगदीश झा ने पाँच कट्ठा खेत बेच दिया।
जिस खेत में कभी निरंजन ने हल चलाना सीखा था…
अब वहाँ किसी और की फसल उगने वाली थी।
रजिस्ट्री से लौटते समय जगदीश झा ने सिर्फ इतना कहा—
“जमीन फेर खरीदल जा सकै छै… लेकिन बेटा के इज्जत नै।”
निरंजन ने सिर झुका लिया।
उसे लगा…
उसके कारण पिता अपनी पूरी उम्र की कमाई बेच रहे हैं।
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उधर मंजरी अब विवाह योग्य हो चुकी थी।
एक अच्छा रिश्ता आया।
लड़के वाले आए।
चाय पी।
बातचीत हुई।
सब ठीक लग रहा था।
तभी किसी ने धीरे से कहा—
“इनका बेटा हत्या के केस में है।”
बस इतना सुनना था।
रिश्ता वहीं टूट गया।
उस रात मंजरी बहुत देर तक रोती रही।
निरंजन उसके कमरे के बाहर खड़ा था।
अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई।
उसे लगा…
उसकी बहन की आँखों के आँसू भी उसी मुकदमे की फाइल में दर्ज हो चुके हैं।
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पहले सीता देवी खूब गाती थीं।
काम करते हुए मैथिली के लोकगीत गुनगुनाती रहती थीं।
अब उन्होंने गाना छोड़ दिया था।
वह हर सोमवार शिवलिंग पर जल चढ़ातीं।
हर पूर्णिमा को व्रत रखतीं।
हर छठ पर एक ही प्रार्थना करतीं—
“हे सूर्य देव… हमर बेटा के निर्दोष साबित कऽ दिअ।”
लोग कहते—
“इतनी पूजा क्यों करती हो?”
वह मुस्कुरा देतीं।
लेकिन रात में तकिए में मुँह छिपाकर रोतीं।
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एक दिन निरंजन ने वकील से पूछा—
“बाबू साहेब… ई मुकदमा आखिर खत्म कहिया होत?”
वकील ने फाइल बंद की।
“जब सारे गवाहों की गवाही हो जाएगी।”
“कतेक दिन?”
वकील मुस्कुराए नहीं।
उन्होंने सिर्फ इतना कहा—
“अदालत में समय कोई नहीं बता सकता।”
यही जवाब धीरे-धीरे निरंजन की जिंदगी का सबसे बड़ा डर बन गया।
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साल बीतने लगे।
हर साल गाँव में बाढ़ आती।
फिर पानी उतर जाता।
धान कटता।
छठ आता।
होली आती।
दीवाली आती।
लेकिन मुकदमा वहीं रहता।
बस फाइल थोड़ी और मोटी हो जाती।
निरंजन की उम्र बढ़ती जाती।
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एक दिन उसने पुरानी कॉपी निकाली।
पहले पन्ने पर लिखा—
“आज पहली तारीख़।”
फिर दूसरी…
तीसरी…
दसवीं…
पच्चीसवीं…
पचासवीं…
धीरे-धीरे वह कॉपी अदालत की तारीख़ों से भरने लगी।
उसे डर था—
कहीं ऐसा न हो कि एक दिन उसे अपना जन्मदिन भूल जाए…
लेकिन अदालत की अगली तारीख़ याद रहे।
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रात को वह अक्सर छत पर लेट जाता।
आसमान देखता।
और खुद से पूछता—
“अगर मैं उस रात दूसरी बस पकड़ लेता तो?”
“अगर मैं पाँच मिनट पहले उतर जाता तो?”
“अगर मैं उस रास्ते गया ही नहीं होता तो?”
लेकिन जिंदगी में “अगर” का कोई न्यायालय नहीं होता।
जो हो गया…
उसी का मुकदमा चलता है।
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उस वर्ष की आखिरी सुनवाई में फिर वही हुआ।
जज साहब ने फाइल देखी।
एक गवाह नहीं आया था।
सुनवाई टल गई।
बाबू ने ऊँची आवाज़ में कहा—
“अगली तारीख़…”
निरंजन ने पहली बार उस शब्द को ध्यान से सुना।
उसे लगा…
यह कोई तारीख़ नहीं।
यह उसकी जिंदगी का नया नाम है।
वह अदालत की सीढ़ियाँ उतर रहा था।
पीछे दीवार पर न्याय की देवी की तस्वीर लगी थी—आँखों पर पट्टी बँधी हुई।
निरंजन कुछ पल रुका।
धीरे से बोला—
“माँ कहती हैं कि भगवान सब देखते हैं… लेकिन यहाँ तो न्याय भी आँखों पर पट्टी बाँधकर बैठा है।”
उसकी आवाज़ हवा में खो गई।
और अदालत के बरामदे में फिर किसी बाबू की आवाज़ गूँजी—
“अगला मुकदमा बुलाइए…”
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चैप्टर –3 समाप्त
अगले अध्याय में आप पढेंगे की कैसे “समाज की अदालत” में कहानी और गहरी होगी। क्या निरंजन की शादी, रिश्तों का संघर्ष, समाज का तिरस्कार और यह सवाल सामने आएगा कि क्या अदालत से पहले समाज अपना फैसला सुना देता है।
