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“कुछ स्त्रियाँ केवल पति का हाथ नहीं थामतीं, वे उसका भाग्य, उसका संघर्ष और उसका अपमान भी अपने हिस्से में ले लेती हैं।”

मुकदमे को पाँच साल बीत चुके थे।

कमलपुर की सुबहें अब भी वैसी ही थीं—तुलसी चौरा पर जलता दीप, खेतों में ओस की बूँदें, दूर से आती कोयल की आवाज़। लेकिन जगदीश झा के घर में अब हर सुबह की शुरुआत एक ही बात से होती—

“अगली तारीख़ कब है?”

घर की दीवार पर नया कैलेंडर टंग जाता, पर पुराने कैलेंडर उतारे नहीं जाते। हर पुराने कैलेंडर पर लाल गोले बने थे—अदालत की तारीख़ों के।

वे कैलेंडर अब समय नहीं, संघर्ष गिनते थे।

एक शाम गाँव के शिक्षक शिवनाथ मिश्र फिर आए।

इस बार उनके साथ एक अधेड़ व्यक्ति भी थे—हरिप्रसाद चौधरी, पड़ोसी गाँव बिस्फी के रहने वाले।

कुछ औपचारिक बातें हुईं।

फिर हरिप्रसाद ने सीधी बात कही—

“हम अपनी बेटी मैथिली का रिश्ता लेकर आए हैं।”

जगदीश झा चौंक गए।

“आपको… सब मालूम है?”

“हाँ, सब मालूम है।”

“फिर भी?”

हरिप्रसाद ने शांत स्वर में कहा—

“आरोप और अपराध में फर्क होता है। जब तक अदालत दोष सिद्ध नहीं करती, मैं किसी को अपराधी नहीं मानता।”

सीता देवी की आँखें भर आईं।

उन्हें लगा जैसे कई वर्षों बाद किसी ने उनके बेटे को उसके नाम से पुकारा है, मुकदमे से नहीं।

उधर मैथिली से भी पूछा गया।

“बेटी, सोच लो। जिस लड़के से तुम्हारी शादी होगी, उसके ऊपर हत्या का मुकदमा चल रहा है।”

मैथिली ने कुछ देर चुप रहकर कहा—

“अगर वह सचमुच अपराधी होता, तो मैं कभी तैयार नहीं होती। लेकिन अगर वह निर्दोष है, तो सबसे कठिन समय में उसका साथ छोड़ देना भी तो अन्याय होगा।”

उसकी माँ ने पूछा—

“अगर कल सज़ा हो गई तो?”

मैथिली ने धीमे स्वर में उत्तर दिया—

“तो मैं उसकी पत्नी होकर उसका इंतज़ार करूँगी।”

घर में सन्नाटा छा गया।

जब निरंजन को यह रिश्ता बताया गया, उसने तुरंत मना कर दिया।

“बाबूजी, मैं किसी की बेटी की ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर सकता।”

जगदीश झा बोले—

“बेटा, हरिप्रसाद जी सब जानते हैं।”

“जानते हैं, फिर भी गलती कर रहे हैं।”

सीता देवी ने बेटे का हाथ पकड़ लिया।

“हर आदमी दुख से भागे, तऽ सुख बाँटै वाला के रहत?”

निरंजन चुप हो गया।

दोनों परिवारों ने मिलने का निश्चय किया।

आँगन में आम का पेड़ था।

उसी के नीचे चारपाइयाँ बिछी थीं।

कुछ देर बाद सबने दोनों को अकेले बात करने की अनुमति दी।

मैथिली ने सबसे पहले पूछा—

“क्या आपने सचमुच…?”

वह वाक्य पूरा नहीं कर पाई।

निरंजन मुस्कराया, लेकिन वह मुस्कान दर्द से भरी थी।

“अगर मैंने किया होता, तो शायद आज आपकी आँखों में देखकर बात न कर पाता।”

मैथिली ने उसकी आँखों में देखा।

वहाँ डर था।

थकान थी।

लेकिन छल नहीं था।

कुछ क्षण बाद उसने कहा—

“मुझे आपके मुकदमे से नहीं, आपके झूठ से डर लगता।”

निरंजन ने पहली बार कई वर्षों बाद किसी अजनबी के सामने सहज होकर साँस ली।

शादी बिना शोर-शराबे के हुई।

न बैंड-बाजा।

न बड़ी बारात।

न सैकड़ों मेहमान।

सिर्फ़ कुछ रिश्तेदार, कुछ पड़ोसी और गाँव का छोटा-सा मंदिर।

जब पंडित ने सिंदूरदान का समय बताया, निरंजन के हाथ काँप रहे थे।

उसने धीरे से कहा—

“मैथिली… अभी भी समय है।”

मैथिली ने मुस्कराकर उत्तर दिया—

“अब समय पीछे नहीं जाता।”

उसने सिर झुका दिया।

सिंदूर की वह लाल रेखा केवल विवाह का प्रतीक नहीं थी।

वह संघर्ष की साझेदारी की रेखा थी।

रात को कमरे में गहरा सन्नाटा था।

मैथिली ने धीरे से पूछा—

“आप सबसे ज़्यादा किस बात से डरते हैं?”

निरंजन ने कुछ देर बाद कहा—

“मुझे जेल से डर नहीं लगता।”

“फिर?”

“मुझे इस बात से डर लगता है कि कहीं एक दिन तुम भी मुझ पर विश्वास करना छोड़ दो।”

मैथिली ने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया।

“जिस दिन ऐसा होगा, उस दिन मैं पत्नी कहलाने का अधिकार खो दूँगी।”

निरंजन की आँखें भर आईं।

अगली सुनवाई पर पहली बार मैथिली भी साथ गई।

अदालत के बाहर लंबी भीड़ थी।

वह चुपचाप बेंच पर बैठी रही।

एक महिला ने पास आकर पूछा—

“कौन हैं आप?”

मैथिली ने सहज स्वर में कहा—

“आरोपी की पत्नी।”

महिला ने सहानुभूति से देखा।

“बहुत कठिन होगा।”

मैथिली ने उत्तर दिया—

“कठिन है… लेकिन सच का साथ आसान कब था?”

सुनवाई फिर टल गई।

वापसी में बस की खिड़की से बाहर देखते हुए निरंजन बोला—

“मुझे लगता है, मेरी ज़िंदगी भी इसी बस जैसी हो गई है। चलती रहती है, पर मंज़िल नहीं आती।”

मैथिली ने मुस्कराकर कहा—

“बस की मंज़िल देर से सही, आती तो है।”

निरंजन ने पहली बार महसूस किया कि उसकी लड़ाई अब अकेली नहीं रही।

उस रात घर लौटकर मैथिली ने आँगन में तुलसी के पास एक नया दीप जलाया।

सीता देवी ने पूछा—

“इतना रात में?”

मैथिली बोली—

“जब घर में अँधेरा ज़्यादा हो, तब एक दीप और जलाना चाहिए।”

सीता देवी ने उसे गले लगा लिया।

उनके आँसू बह रहे थे।

लेकिन इस बार वे केवल दुख के नहीं थे।

उनमें उम्मीद भी थी।

उस दिन निरंजन ने अपनी डायरी में केवल एक पंक्ति लिखी—

> “आज पहली बार लगा कि शायद भगवान ने मेरा मुकदमा नहीं, मेरा साथ सुन लिया है।”


अध्याय–5 समाप्त

अगले अध्याय में आप पढ़ेगें की– कैसे कहानी समय की लंबी छलाँग लगाएगी। क्या निरंजन जीवन अदालत की तारीख़ों, फाइलों और आर्थिक संघर्ष के बीच बीतेगा?