#MNN24X7 कथा आरंभ
मिथिला के एक छोटे से गाँव अन्नवर्षा की सुबह हमेशा की तरह शांत थी। खेतों में ओस की बूंदें चमक रही थीं, दूर कहीं बैलों की घंटियाँ बज रही थीं और सूरज की हल्की किरणें धान के खेतों पर सुनहरी चादर बिछा रही थीं।
लेकिन इस सुंदरता के पीछे एक कड़वा सच छिपा था।
गाँव के अधिकांश खेत किसानों के नहीं, ठेकेदारों के कब्जे में थे।
किसान अपनी जमीन दूसरों को खेती के लिए दे देते थे और बदले में साल के अंत में थोड़ा सा हिस्सा लेकर संतुष्ट हो जाते थे।
उनके खेतों से लाखों की फसल निकलती थी…
लेकिन उनके हाथ में आता था सिर्फ कुछ हजार।
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इसी गाँव में जन्मा था एक लड़का — अभय।
उसके पिता रामनाथ सिंह सरकारी नौकरी में थे और चाहते थे कि उनका बेटा पढ़-लिखकर बड़ा अधिकारी बने।
अभय बचपन से ही तेज था।
स्कूल के मास्टर अक्सर कहते —
“रामनाथ जी, आपका बेटा बहुत आगे जाएगा।”
रामनाथ मुस्कुराते हुए कहते —
“बस भगवान का आशीर्वाद है।”
बारहवीं के बाद अभय पढ़ाई के लिए पटना चला गया।
वहाँ उसने कृषि विज्ञान और ग्रामीण विकास पर पढ़ाई शुरू की।
—
शहर में पढ़ते हुए भी अभय का मन गाँव में ही लगा रहता था।
एक दिन कॉलेज में प्रोफेसर ने पूछा —
“भारत की सबसे बड़ी समस्या क्या है?”
किसी ने कहा बेरोजगारी।
किसी ने कहा भ्रष्टाचार।
अभय खड़ा हुआ।
“सर, भारत की सबसे बड़ी समस्या है कि किसान अपनी मेहनत का सही मूल्य नहीं पाता।”
कक्षा में सन्नाटा छा गया।
प्रोफेसर ने मुस्कुराकर कहा —
“तुम सही दिशा में सोच रहे हो।”
—
छुट्टियों में अभय कई साल बाद गाँव लौटा।
लेकिन इस बार जो उसने देखा…
वह उसे अंदर तक झकझोर गया।
गाँव के चौक पर कुछ किसान बैठे थे।
अभय ने पूछा —
“चाचा, खेती कैसी चल रही है?”
एक बुजुर्ग किसान हँस पड़े।
“बेटा, खेती अब हम कहाँ करते हैं… ठेकेदार करते हैं।”
“आप लोग क्यों नहीं करते?”
“पैसा कहाँ है? मशीन कहाँ है? बीज कहाँ है? और बाजार कहाँ है?”
अभय चुप हो गया।
—
अगले दिन वह खेतों की तरफ गया।
दूर-दूर तक हरी फसलें लहरा रही थीं।
लेकिन खेतों में काम करने वाले मजदूर थे।
मालिक नहीं।
अभय ने एक मजदूर से पूछा —
“यह खेत किसका है?”
“गाँव के लोगों का है।” एक मजदूर बोला।
“तो खेती कौन कर रहा है?”
“शहर का ठेकेदार।” उसी मजदूर ने फिर से जबाब दिया।
“कितना हिस्सा मिलता है?”
“बस… थोड़ा सा।” सभी मजदूर एक स्वर में।
अभय के भीतर कुछ टूट गया।
—
शाम को उसने गाँव के लोगों की बैठक बुलवाई।
चौपाल पर लगभग पचास लोग इकट्ठा हुए।
अभय ने पूछा —
“आप लोग अपनी जमीन ठेके पर क्यों देते हैं?”
एक किसान बोला —
“बेटा, हमें खेती का ज्ञान नहीं है।”
दूसरा बोला —
“मशीन महंगी है।”
तीसरा बोला —
“बीज और खाद का खर्चा नहीं उठा सकते।”
अभय ने गहरी सांस ली।
फिर बोला —
“अगर मैं यह सब व्यवस्था कर दूँ तो?”
लोग चौंक गए।
“कैसे?”
अभय ने कहा —
“कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक मदद करेंगे।
आधुनिक खेती होगी।
मशीनें किराए पर मिलेंगी।
और फसल सीधे बाजार में जाएगी।”
लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
किसी को विश्वास नहीं हो रहा था।
—
अभय ने अगले ही दिन कृषि विज्ञान केंद्र जाने का फैसला किया।
वहाँ उसने वैज्ञानिकों से मुलाकात की।
“सर, मेरे गाँव के लोग खेती छोड़ चुके हैं।”
वैज्ञानिक बोले —
“ऐसा पूरे देश में हो रहा है।”
अभय बोला —
“लेकिन मैं इसे बदलना चाहता हूँ।”
वैज्ञानिक मुस्कुराए।
“अगर किसान तैयार हों तो हम पूरा सहयोग देंगे।”
—
अभय ने गाँव के तीन किसानों को तैयार किया।
“बस एक बीघा जमीन मुझे दीजिए।”
किसानों ने डरते-डरते हामी भर दी।
अभय ने आधुनिक तकनीक से खेती शुरू की।
ड्रिप सिंचाई।
उन्नत बीज।
जैविक खाद।
गाँव के लोग रोज देखने आते।
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तीन महीने बाद जब फसल तैयार हुई…
पूरा गाँव देखने आया।
उसी एक बीघा जमीन से जितनी सब्जी निकली…
उतनी पहले तीन बीघा से भी नहीं निकलती थी।
किसान दंग रह गए।
एक किसान बोला —
“बेटा, यह कैसे हुआ?”
अभय मुस्कुराया।
“ज्ञान से।”
—
लेकिन यह सब देखकर ठेकेदार खुश नहीं थे।
उन सब जो उनका मुखिया था
उसका नाम था भैरव सिंह।
उसने सभी व्यापारियों से कहा —
“अगर यह लड़का ऐसे ही चलता रहा तो हमारा धंधा खत्म समझो।”
एक आदमी बोला —
“क्या करें?”
भैरव की आँखों में खतरनाक चमक थी।
“उसे रोकना होगा।”
—
उधर अभय भी शांत नहीं बैठा था।
उसने एक युवा संगठन बनाया।
नाम रखा —
“कृषि नवजागरण समिति”
संगठन के युवा घर-घर जाकर लोगों को समझाने लगे।
“अपनी जमीन खुद जोतिए।”
धीरे-धीरे लोग तैयार होने लगे।
गाँव में पहली बार ट्रैक्टर आया।
लोगों ने ताली बजाई।
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एक साल के अंदर ही गाँव बदलने लगा।
जहाँ पहले ठेकेदार खेती करते थे…
अब वहाँ खुद किसान काम कर रहे थे।
गाँव में आय बढ़ने लगी।
लोगों ने नए घर बनवाए।
बच्चे अच्छे स्कूल जाने लगे।
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लेकिन भैरव सिंह भी हार मानने वाला नहीं था।
उसने एक योजना बनाई।
उसने एक दिन उसने अभय को शहर बुलाया।
संदेश था।
“एक बड़ा निवेशक तुमसे मिलना चाहता है।”
अभय भोला था।
वह चला गया।
लेकिन वहाँ से वापस लौटते वक्त…
उस पर हमला कर दिया गया।
उसे बुरी तरह पीटा गया।
और सड़क किनारे फेंक दिया गया।
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जब यह खबर गाँव पहुँची…
पूरा गाँव शहर की ओर दौड़ पड़ा।
अस्पताल में डॉक्टर बोले —
“बहुत खून बह चुका है।”
गाँव वालों ने कहा —
“हम खून देंगे।”
एक नहीं…
दस नहीं…
पचास लोगों ने खून दिया।
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कई दिनों बाद जब अभय की आँखें खुलीं।
उसने देखा —
पूरा गाँव उसके सामने खड़ा था।
एक बूढ़ा किसान रोते हुए बोला —
“बेटा, तुम हमारे लिए भगवान हो।”
अभय की आँखों में आँसू आ गए।
—
कुछ साल बाद…
गाँव में पंचायत चुनाव हुआ।
लोगों ने एक ही नाम लिखा —
अभय।
वह भारी बहुमत से सरपंच बन गया।
—
आज अन्नवर्षा गाँव पूरे जिले में उदाहरण बन चुका है।
आसपास के गाँव सीखने आते हैं।
लोग कहते हैं —
“अगर एक युवक ठान ले…
तो पूरे गाँव की किस्मत बदल सकती है।”
