रिपोर्ट: विशेष संवाददाता
#MNN24X7 पटना/दरभंगा: देश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर व्यापक बहस छिड़ गई है। “एक देश, एक पाठ्यक्रम” की मांग जोर पकड़ती जा रही है। बढ़ती स्कूल फीस, हर वर्ष बदलते पाठ्यक्रम और महंगी किताबों के कारण अभिभावकों पर बढ़ते आर्थिक बोझ ने इस मुद्दे को गंभीर बना दिया है।

विशेषज्ञों और अभिभावकों का कहना है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली न केवल आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो गई है, बल्कि बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। छोटे-छोटे बच्चों के कंधों पर भारी बस्ते और लगातार बदलती किताबों का दबाव साफ तौर पर देखा जा सकता है।
जानकारों के अनुसार, बच्चों के स्कूल बैग का वजन उनके शरीर के कुल वजन का 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए, लेकिन अधिकांश स्कूलों में यह सीमा पार होती दिख रही है। इससे बच्चों में कमर दर्द, थकान और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
हर साल बदलते पाठ्यक्रम से बढ़ी परेशानी
अभिभावकों का कहना है कि निजी विद्यालयों में हर साल पाठ्यक्रम बदलने की प्रवृत्ति आम हो गई है। इसके कारण उन्हें हर वर्ष नई किताबें खरीदनी पड़ती हैं। इतना ही नहीं, बड़े बच्चों की पुरानी किताबें छोटे भाई-बहनों के काम नहीं आ पातीं, जिससे अतिरिक्त खर्च बढ़ जाता है।
इसके साथ ही पर्यावरण पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। हर साल बड़ी मात्रा में कागज बेकार हो जाता है, जो वनों की कटाई और प्रदूषण को बढ़ावा देता है।
एक समान पाठ्यक्रम से मिल सकती है राहत
शिक्षाविदों का मानना है कि यदि पूरे देश में एक समान पाठ्यक्रम, विशेषकर एनसीईआरटी आधारित, लागू किया जाए तो इससे शिक्षा सस्ती और सुलभ हो सकती है। इससे न केवल शिक्षा की गुणवत्ता में समानता आएगी, बल्कि छात्रों के बीच प्रतिस्पर्धा का स्तर भी संतुलित होगा।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि स्कूलों के भवन, संसाधन और प्रबंधन अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन पढ़ाई की सामग्री एक समान होनी चाहिए, ताकि हर वर्ग के बच्चों को समान अवसर मिल सके।
एक देश, एक परीक्षा प्रणाली की ओर कदम
हाल के वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए समान परीक्षा प्रणाली लागू करने जैसे प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माने जा रहे हैं। इससे पारदर्शिता और निष्पक्षता को बढ़ावा मिला है।
व्यापक चर्चा की जरूरत
शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि “एक देश, एक पाठ्यक्रम” जैसे महत्वपूर्ण विषय पर सरकार, शिक्षाविदों, अभिभावकों और विद्यार्थियों के बीच व्यापक संवाद होना चाहिए। सभी पक्षों के सुझावों को ध्यान में रखते हुए ऐसी नीति बनाई जानी चाहिए जो सभी के हित में हो।
समाज से सहयोग की अपील
विशेषज्ञों ने समाज के सभी वर्गों से इस दिशा में सकारात्मक पहल करने और जागरूकता बढ़ाने की अपील की है। उनका कहना है कि शिक्षा को सरल, सस्ती और समान बनाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है।
अब देखना यह होगा कि सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाती है और क्या देश में एक समान पाठ्यक्रम लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।
