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#MNN24X7 कथा आरंभ

आज यतेंद्र पार्क में बैठा बस कुछ सोचे जा रहा था,और शाम ढल रही है। बच्चों की हँसी, बुजुर्गों की धीमी चाल, मोबाइल में झुके लोग—हर कोई अपनी दुनिया में मग्न थे। मगर इस भीड़ के बीच मैं अकेला यतेंद्र उर्फ यती जाने किस सोच में गुम था। उसके भीतर एक ही आवाज़ बार-बार उठ रही थी कि —मैथिल कौन?

यह सवाल आज अचानक उसके दिमाग में नहीं आया। यह उसके वर्षों की चुप्पी, अनुभव और अंदर जमा होती गई बेचैनी का ही परिणाम था। उसने सोचा- कभी लगता है मैं वही हूँ जो अपने गांव की मिट्टी से बना था—खेतों की खुशबू, मखान की मिठास, और पोखर के पानी की ठंडक से जुड़ा हुआ। लेकिन फिर सोचता हूँ—अगर मैं सच में वही हूँ, तो मैं आज यहाँ, इस पार्क में, अपने ही सवालों से क्यों घिरा हूँ?

मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ और बचपन सामने आ जाता है। मिट्टी का घर, आँगन में तुलसी, और शाम को जलता हुआ दिया। माँ की आवाज़—“पढ़ ले बेटा, पढ़-लिख जाएगा तो जिंदगी सुधर जाएगी।” उस समय यह वाक्य सिर्फ सलाह लगता था, लेकिन आज समझ आता है कि वह एक पूरी पीढ़ी का सपना था।

गांव में मेरा एक दोस्त था—रति। वह मुझसे अलग था। मैं हमेशा बाहर जाने, कुछ बड़ा करने के सपने देखता था, लेकिन रति का सपना गांव ही था। वह कहता—“हम यहीं रहकर कुछ करेंगे, अपने लोगों के लिए।” उसकी आँखों में एक सच्चाई थी, एक विश्वास था।

लेकिन समय ने उसे क्या दिया?

रति धीरे-धीरे गांव का “आदमी” बन गया—हर काम के लिए बुलाया जाने वाला आदमी। किसी को कागज बनवाना हो, किसी को सरकारी दफ्तर में मदद चाहिए, किसी को खेत में काम करवाना हो—रति हर जगह मौजूद रहता। वह सबका था… लेकिन उसका अपना कोई नहीं था।

मैंने उसे कई बार थका हुआ देखा, लेकिन उसके चेहरे पर शिकायत नहीं थी। शायद उसने अपनी जिंदगी को यही मान लिया था।

और मैं?

मैं गांव छोड़कर निकल गया।

पहली बार जब दिल्ली गया, तो दिल में एक ही बात थी—“भारत मेरा देश है, यहाँ कहीं भी रह सकता हूँ।” उस समय मुझे नहीं पता था कि देश एक है, लेकिन सोच अलग-अलग है।

दिल्ली पहुँचते ही पहली बार मुझे एहसास हुआ कि मैं “बिहारी” हूँ।

पहले यह शब्द सिर्फ एक पहचान था—भौगोलिक पहचान। लेकिन यहाँ यह एक धारणा बन चुका था। एक नजर, एक अंदाज, जिसमें सम्मान नहीं, बल्कि एक दूरी थी।

कॉलेज के पहले दिन ही किसी ने मजाक में कहा—“अरे, बिहारी है क्या?”
और फिर हँसी।

वो हँसी मेरे कानों में आज भी गूंजती है।

उस उम्र में हम 18-19 साल के थे। न इतनी समझ थी कि हर बात का जवाब दे सकें, न इतनी ताकत कि हर अपमान का विरोध कर सकें। कई बार बात बढ़ती, गाली तक पहुँचती, कभी-कभी हाथापाई तक।

लेकिन हम चुप रहे।

क्योंकि हमें पढ़ना था।

क्योंकि हमें आगे बढ़ना था।

और सबसे ज्यादा—क्योंकि हमें अपनी इज्जत बचानी थी।

धीरे-धीरे यह सब आदत बन गया। जैसे कोई दर्द जो पहले चुभता है, फिर धीरे-धीरे सुन्न हो जाता है। लेकिन वह दर्द कहीं जाता नहीं, बस अंदर दब जाता है।

मैंने देखा—बहुत से लड़के-लड़कियाँ अपनी पहचान छुपाने लगे। कोई कहता—मैं झारखंड से हूँ, कोई कहता—मैं यूपी से हूँ। क्योंकि हर बार अपने बारे में सच बताना मतलब हर बार अपमान का खतरा उठाना।

एक बार पुणे में एक प्रोफेसर ने मुझसे पूछा—“तुम कहाँ से हो?”
मैंने कहा—“दरभंगा।”
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, तुम दिखते ही हो बिहारी।”

मैं उस दिन समझ नहीं पाया कि यह तारीफ थी या तंज।

क्या बिहारी होना कोई चेहरा है?

क्या मैथिल होना सिर्फ एक बोली है?

या यह सब मिलकर एक ऐसी पहचान बनाते हैं, जिसे हम खुद भी पूरी तरह नहीं समझ पाए?

समय बीतता गया। मैंने काम किया, संघर्ष किया, धीरे-धीरे जिंदगी बदलती गई। दिल्ली में काम शुरू किया—चमड़े की फैक्ट्री में। शुरुआत कठिन थी। छोटे कमरे में रहना, खुद खाना बनाना, पैसों की तंगी, और हर दिन खुद को साबित करने की कोशिश।

लेकिन धीरे-धीरे हालात बदलने लगे। संगम विहार में एक छोटा-सा प्लॉट लिया। फिर वहीं एक छोटी दुकान खोली। दिन-रात मेहनत की। पत्नी और बच्चों को साथ लाया। धीरे-धीरे दुकान बड़ी हुई, कारोबार बढ़ा, और जिंदगी पटरी पर आने लगी।

आज लोग मुझे “शाह साहब” कहते हैं।

यह सुनकर अच्छा लगता है।

लेकिन जब मैं अकेला होता हूँ, तो एक सवाल उठता है—क्या मैंने सब कुछ पा लिया?

या कुछ बहुत जरूरी खो दिया?

मुझे अपना गांव याद आता है। वह पोखर, वह कच्ची सड़क, वह स्कूल जहाँ से मैंने पढ़ाई शुरू की। और सबसे ज्यादा—वह अपनापन, जो अब कहीं नहीं मिलता।

मैंने दुनिया देखी है—दिल्ली, मुंबई, पुणे, बैंगलोर। हर जगह लोग मिले, काम मिला, सम्मान मिला। लेकिन हर जगह एक दूरी भी महसूस हुई।

और तब समझ आया—हम कहीं भी चले जाएँ, अपनी जड़ों से पूरी तरह अलग नहीं हो सकते।

लेकिन फिर सवाल उठता है—अगर हम अपनी जड़ों से जुड़े हैं, तो हमारी जड़ें इतनी कमजोर क्यों हैं?

हम बार-बार कहते हैं—हमें गर्व है।

हम अपने इतिहास की बातें करते हैं—अशोक, बुद्ध, चाणक्य। हम बताते हैं कि हमारे यहाँ से कितने लोग IIT, IIM जाते हैं।

लेकिन सच्चाई यह है—इतिहास पर गर्व करने से वर्तमान नहीं बदलता।

अगर वर्तमान मजबूत नहीं है, तो इतिहास सिर्फ कहानी बनकर रह जाता है।

आज मिथिला के लोग दुनिया भर में नाम कमा रहे हैं। यूट्यूबर, कलाकार, प्रोफेशनल—हर क्षेत्र में लोग आगे बढ़ रहे हैं।

लेकिन मिथिला?

वह वहीं का वहीं है।

हम बाहर बैठकर वीडियो बनाते हैं—“देखो, मिथिला में यह है, वह है…” लेकिन हम खुद वहाँ रहकर कुछ नहीं करते।
ना अब डबरा बचा ना जंगल।

मखान भी पोखर और खेत के सहारे बचा है गांव में।
शहर में तो पोखर भी गायब हो रहा है।

बस हम अपनी मिट्टी की महानता बताते हैं, लेकिन उस मिट्टी को मजबूत करने की कोशिश नहीं करते।

यही सबसे बड़ा विरोधाभास है।

आज हमारे सिनेमा को फूहड़ कहा जाता है। हमारी संस्कृति को मजाक में लिया जाता है। और हम क्या करते हैं?

या तो हम चुप रहते हैं, या फिर हम झूठे गर्व का सहारा लेते हैं।

लेकिन सच्चाई यह है—बदलाव बिना स्वीकार के नहीं आता।

हमें यह मानना होगा कि हम पीछे रह गए हैं।

और फिर यह तय करना होगा कि हमें आगे कैसे बढ़ना है।

इसके लिए सबसे जरूरी है—अपनी पहचान को समझना।

मैथिल होना सिर्फ एक शब्द नहीं है।

यह एक जिम्मेदारी है।

यह अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, और अपनी जमीन के प्रति एक कर्तव्य है।

अगर हम अपनी मातृभाषा को नहीं बचा पाए, तो हम अपनी पहचान भी नहीं बचा पाएंगे।

“मातृभाषा” और “मातृभूमि” में “मातृ” यूँ ही नहीं लगा है।

यह हमें जोड़ता है—हमारी जड़ों से, हमारी आत्मा से।

आज जरूरत है कि हम बाहर की दुनिया को समझें, लेकिन अपनी जड़ों को न भूलें।

जरूरत है कि हम अपने बच्चों को सिर्फ अंग्रेजी नहीं, अपनी भाषा भी सिखाएँ।

जरूरत है कि हम अपने गांव को सिर्फ याद न करें, बल्कि उसके लिए कुछ करें।

क्योंकि अगर हम ऐसा नहीं करेंगे, तो अगली पीढ़ी भी हमारे जैसी ही होगी—सफल, लेकिन अधूरी।

और फिर शायद वो भी किसी पार्क में बैठकर यही सवाल पूछेगी—

“मैथिल कौन?”

और उस दिन शायद उनके पास भी कोई जवाब नहीं होगा।

लेकिन अभी समय है।

अभी हम जवाब खोज सकते हैं।

और शायद जवाब बहुत दूर नहीं है।

वो हमारे अंदर ही है—हमारी सोच में, हमारे फैसलों में, और हमारी जिम्मेदारियों में।

जब हम अपने लिए नहीं, अपनी मिट्टी के लिए सोचने लगेंगे…

जब हम गर्व बोलने के बजाय उसे जीने लगेंगे…

तब शायद यह सवाल खुद ही खत्म हो जाएगा—

“मैथिल कौन?”

क्योंकि तब हर मैथिल अपने आप में एक जवाब होगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित, लेखक – आशुतोष कुमार झा)