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#MNN24X7 कथा आरंभ
गांव की सुबह का अपना एक अलग ही रंग होता है। जैसे ही पूरब दिशा में हल्की लालिमा फैलती है, वैसे ही गाँव के आँगनों में हलचल शुरू हो जाती है। कहीं तुलसी चौरा पर दीप जल रहा होता है, कहीं कोई औरत माटी से आँगन लीप रही होती है, तो कहीं दूर खेतों की ओर जाते बैलों की घंटियों की धीमी आवाज़ वातावरण में घुल जाती है।

दरभंगा जिले के एक कस्बे—बहेड़ी के पास बसे एक पुराने मोहल्ले में एक बड़ा-सा घर था। घर की दीवारों पर समय की परतें चढ़ी थीं, लेकिन भीतर अब भी संस्कार, परंपरा और रिश्तों की गर्माहट थी। इसी घर में रहते थे—अमरेश बाबू, उनकी पत्नी कमला देवी, और उनका छोटा बेटा निशांत।

निशांत शहर में नौकरी करता था—दरभंगा से थोड़ा बाहर एक निजी कंपनी में। उसकी पत्नी सुमन, मधुबनी जिले के एक शिक्षित परिवार से आई थी। वह पढ़ी-लिखी थी, बीएड किया था, लेकिन शादी के बाद उसने नौकरी करने का विचार छोड़ दिया, क्योंकि घर की जिम्मेदारियाँ ही उसके सामने बड़ी थीं।

सुमन का स्वभाव बहुत सरल था। वह हर काम पूरे मन से करती थी। खासकर खाना बनाना—उसके हाथ का स्वाद पूरे परिवार में मशहूर था। शुरू-शुरू में यह तारीफ उसे बहुत अच्छी लगती थी, लेकिन धीरे-धीरे यही तारीफ उसकी जिम्मेदारी बनती चली गई।

घर में कोई भी मेहमान आता—“सुमन बना देगी।”
कोई पूजा होती—“बहू सब संभाल लेगी।”
कोई शादी-ब्याह का कार्यक्रम—“सुमन है ना, चिंता क्या है।”

शुरुआत में सुमन मुस्कुराकर सब करती रही। उसे लगता था कि यही तो उसका परिवार है, यही उसका कर्तव्य है। लेकिन समय के साथ यह “कर्तव्य” एक “बोझ” में बदलने लगा।

कमला देवी अपने समय की एक सख्त लेकिन पारंपरिक सोच वाली महिला थीं। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी घर-परिवार में लगा दी थी और अब उन्हें लगता था कि बहू का भी यही कर्तव्य है। उन्हें यह समझ ही नहीं आता था कि समय बदल चुका है।

एक दिन दोपहर की तेज धूप में, जब हवा भी जैसे थम-सी गई थी, निशांत अपने ऑफिस में बैठा फाइल देख रहा था। तभी उसका फोन बजा—“माँ”।

“हाँ माँ…”
“बेटा, सुन… परसों हमारी शादी की सालगिरह है। तुम लोग आ रहे हो ना?”
निशांत कुछ पल के लिए चुप हो गया। उसे पता था कि इसका मतलब क्या है।
“हाँ माँ, आ जाएँगे।”

कमला देवी के चेहरे पर खुशी आ गई। उन्हें अपने बेटे-बहू के आने का इंतजार था, लेकिन कहीं न कहीं उनके मन में यह भी था कि सुमन आएगी तो सारा काम अच्छे से हो जाएगा।

शाम को जब निशांत घर पहुँचा, सुमन रसोई में थी। मिट्टी के चूल्हे की जगह अब गैस चूल्हा था, लेकिन काम की गर्मी वही थी। उसके माथे पर पसीना था, और आँखों में हल्की थकान।

“सुमन…”
“हाँ?”
“माँ ने बुलाया है… सालगिरह है।”

सुमन का हाथ रुक गया। उसने धीरे से पूछा—“कब?”
“परसों।”

कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

“तुम चले जाओ… मैं नहीं जाऊँगी।”

निशांत चौंक गया—“क्यों?”
सुमन ने उसकी तरफ देखा—उसकी आँखों में इस बार सिर्फ थकान नहीं थी, बल्कि सालों का दबा हुआ दर्द था।

“हर बार क्या होता है, तुम जानते हो। सब लोग बैठकर हँसते हैं, खाते हैं… और मैं सुबह से रात तक रसोई में खड़ी रहती हूँ। अकेले। तुम्हें कभी महसूस हुआ है कि मैं कितना थक जाती हूँ?”

निशांत के पास कोई जवाब नहीं था।

“तुम कहते हो मदद करोगे, लेकिन तुम भी मेहमान बन जाते हो।”

यह बात सीधे उसके दिल में लगी।

उस रात निशांत बहुत देर तक जागता रहा। छत पर लेटा वह आसमान को देख रहा था। दूर कहीं से ढोलक की आवाज़ आ रही थी—शायद किसी शादी का कार्यक्रम था।

उसे अपना बचपन याद आया—कैसे उसकी माँ अकेले सब संभालती थीं। तब उसे यह सब सामान्य लगता था। लेकिन आज, जब वही उम्मीद उसकी पत्नी से की जा रही थी, तो उसे यह गलत लगने लगा।

अगले दिन उसने फैसला कर लिया।

उसने अपनी माँ को फोन किया—
“माँ, हम लोग आएँगे… लेकिन इस बार एक बदलाव होगा।”
“क्या बदलाव?”
“इस बार सारा काम सुमन अकेले नहीं करेगी।”

फोन के उस पार कुछ पल के लिए सन्नाटा रहा।

“अरे बेटा, बहू का काम होता है यह सब…”
“नहीं माँ… बहू का काम सिर्फ सेवा करना नहीं होता। वह भी इस घर की सदस्य है।”

निशांत की आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें दृढ़ता थी।

कमला देवी को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। उन्हें लगा कि उनका बेटा बदल गया है। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।

जब निशांत ने यह बात सुमन को बताई, तो उसे यकीन ही नहीं हुआ।

“सच में?”
“हाँ।”
“अगर फिर वही हुआ तो?”
“इस बार नहीं होगा।”

सुमन के चेहरे पर हल्की-सी उम्मीद आई, लेकिन उसके मन में अब भी डर था।

सालगिरह का दिन आ गया।

घर में हलचल थी। आँगन में अल्पना बनाई गई थी, दरवाजे पर आम के पत्तों की सजावट थी, और रसोई से तरह-तरह के पकवानों की खुशबू आ रही थी।

सुमन जैसे ही रसोई की ओर बढ़ी, निशांत ने उसका हाथ पकड़ लिया—
“आज तुम बैठो… तुम मेहमान हो।”

सुमन ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

निशांत सीधे रसोई में गया—
“आज हम सब मिलकर काम करेंगे।”

पहले तो सबको अजीब लगा।
लेकिन उसने खुद काम शुरू कर दिया।

वह सब्जी काटने लगा, उसके पिताजी आटा गूंथने लगे, पड़ोस की चाची मसाले तैयार करने लगीं। धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा।

सुमन बाहर बैठी थी… पहली बार।

उसके चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह नई थी—सच्ची थी।

कमला देवी यह सब देख रही थीं। उनके मन में एक अजीब-सी हलचल हो रही थी। उन्हें लग रहा था कि शायद उन्होंने अब तक सुमन को सिर्फ “बहू” समझा, “इंसान” नहीं।

शाम को जब मेहमानों ने खाना खाया, तो सब एक ही बात कह रहे थे—
“आज खाना बहुत स्वादिष्ट है।”
“लगता है इसमें सबका प्यार मिला है।”

यह सुनकर कमला देवी की आँखें नम हो गईं।

वह धीरे से सुमन के पास आईं और उसका हाथ पकड़कर बोलीं—
“मुझे माफ कर दो बहू… मैंने कभी तुम्हारी तकलीफ समझने की कोशिश ही नहीं की।”

सुमन की आँखों में आँसू आ गए—
“माँ जी… अब सब ठीक है।”

उस दिन सिर्फ सालगिरह नहीं मनाई गई…
बल्कि एक सोच बदली।

अब उस घर में हर काम मिलकर होता था।
हर खुशी सबके साथ बाँटी जाती थी।
और सबसे बड़ी बात—अब किसी एक पर बोझ नहीं डाला जाता था।

मिथिलांचल की उस मिट्टी में, जहाँ परंपराएँ गहरी जड़ें जमाए बैठी हैं, वहाँ एक छोटा-सा बदलाव आया था—लेकिन उसका असर बहुत बड़ा था।

यह कहानी सिर्फ सुमन और निशांत की नहीं है…
यह हर उस घर की कहानी है, जहाँ बहू को “कर्तव्य” समझ लिया जाता है।

लेकिन सच यह है—
बहू कोई जिम्मेदारी नहीं, एक रिश्ता है।
और रिश्ते बराबरी से निभाए जाते हैं, बोझ बनाकर नहीं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित – मैथिली न्यूज नेटवर्क – आशुतोष कुमार झा)