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अध्याय–1 : एक साधारण युवक

“जिस दिन आरोप लगा, उसी दिन उसकी सज़ा शुरू हो गई थी। अदालत ने तो केवल तारीख़ लिखी थी।”

कथा आरंभ

मिथिलांचल की सुबह का अपना एक अलग ही रंग होता है।

भोर की पहली किरण जब कमला नदी के शांत जल पर पड़ती है, तो ऐसा लगता है मानो किसी ने चाँदी की पतली चादर बिछा दी हो। गाँव के बाहर पीपल के विशाल पेड़ पर बैठी चिड़ियों का कलरव, दूर कहीं मंदिर की घंटी, और खेतों की मेड़ पर चलती ठंडी हवा… सब मिलकर एक ऐसी दुनिया रचते थे जहाँ जीवन कठिन था, पर संतोष से भरा था।

उसी मिट्टी में बसा था कमलपुर।

दरभंगा और मधुबनी की सीमा से अधिक दूर नहीं, यह छोटा-सा गाँव अपनी सादगी के लिए जाना जाता था। यहाँ लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे। किसी के घर बेटी की शादी होती तो पूरा गाँव बाराती बन जाता, और किसी के घर शोक होता तो पूरा गाँव मौन हो जाता।

इसी गाँव के पूरब टोले में रहता था जगदीश झा का परिवार।

न मिट्टी से बहुत अमीर, न हालात से बहुत गरीब।

चार बीघा खेत, एक पुराना खपरैल का घर, आँगन में तुलसी चौरा, बाँस का झुरमुट, एक बूढ़ी गाय और घर के पिछवाड़े लगा आम का पेड़—यही उनकी दुनिया थी।

जगदीश झा गाँव के उन लोगों में थे जिनकी पहचान दौलत से नहीं, ईमानदारी से होती है। लोग कहा करते—

“जगदीश बाबू से उधार ले लो, लेकिन उनका विश्वास मत तोड़ना।”

उनकी पत्नी सीता देवी पूरे गाँव में अपने स्नेह और सहज स्वभाव के लिए जानी जाती थीं। सुबह सूर्योदय से पहले उठना, आँगन लीपना, तुलसी पर जल चढ़ाना और फिर पूरे परिवार के लिए भोजन बनाना—यही उनकी दिनचर्या थी।

उनकी सबसे बड़ी पूँजी था उनका इकलौता बेटा—

निरंजन झा।

उस समय निरंजन की उम्र इक्कीस वर्ष थी।

लंबा कद, साँवला रंग, तेज़ आँखें और चेहरे पर हमेशा रहने वाली हल्की-सी मुस्कान।

वह गाँव के उन युवकों में था जो शहर जाकर बसने का सपना तो देखते थे, लेकिन गाँव छोड़ना नहीं चाहते थे।

सुबह खेतों में पिता का हाथ बँटाता।

दोपहर में कस्बे के पुस्तकालय जाकर अख़बार पढ़ता।

शाम को बच्चों को पढ़ा देता।

और रात में लालटेन की रोशनी में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता।

उसका सपना बहुत बड़ा नहीं था।

वह बस एक सरकारी नौकरी चाहता था।

इतनी कि घर की टूटी छत की जगह पक्की छत बनवा सके।

माँ के हाथों की फटी लकीरों को आराम दे सके।

और पिता से कह सके—

“अब आप खेत में कम जाइए, बाबूजी।”

गाँव के बच्चे उसे बहुत मानते थे।

शाम होते ही उसके आँगन में पाँच-दस बच्चे जुट जाते।

कोई गणित पूछता।

कोई हिंदी।

कोई इतिहास।

निरंजन कभी किसी से पैसे नहीं लेता।

वह कहा करता—

“ज्ञान बेचने की चीज़ नहीं, बाँटने की चीज़ है।”

इसी वजह से गाँव के बुज़ुर्ग उसे प्यार से “मास्टर बाबू” कहने लगे थे।

एक दिन गाँव के विद्यालय के प्रधानाध्यापक शिवनाथ मिश्र खेत की मेड़ पर उससे मिले।

“कहाँ जा रहे हो, निरंजन?”

“कस्बे तक, मास्टर साहब।”

“पढ़ाई कैसी चल रही है?”

“भगवान की कृपा है।”

शिवनाथ मिश्र मुस्कराए।

“भगवान की कृपा के साथ मेहनत भी दिख रही है। याद रखना, बेटा… ईमानदार आदमी हार सकता है, लेकिन छोटा नहीं होता।”

निरंजन ने आदर से उनके चरण छुए।

उसे क्या मालूम था कि आने वाले वर्षों में यही वाक्य उसके जीवन का सहारा बनेगा।

उस वर्ष धान की फसल अच्छी हुई थी।

घर में लंबे समय बाद खुशहाली का माहौल था।

जगदीश झा ने एक शाम भोजन करते हुए कहा—

“सीता, अब लड़के की शादी की बात भी सोचनी चाहिए।”

सीता देवी मुस्कराईं।

“हम तो कब से कह रहे हैं।”

निरंजन झेंप गया।

“अभी कहाँ बाबूजी… पहले नौकरी।”

जगदीश हँस पड़े।

“हमारे ज़माने में पहले शादी होती थी, फिर जिम्मेदारियाँ आदमी को नौकरी ढूँढ़ना सिखा देती थीं।”

तीनों देर तक हँसते रहे।

उस रात घर के आँगन में चाँदनी बिखरी हुई थी।

सीता देवी चुपचाप बेटे को देख रही थीं।

हर माँ की तरह उनके भी छोटे-छोटे सपने थे—

बहू आएगी…

घर में फिर से किलकारियाँ गूँजेंगी…

और एक दिन वे अपने पोते को गोद में खिलाएँगी।

कुछ दिनों बाद गाँव में सामा-चकेवा का पर्व आया।

लड़कियाँ लोकगीत गा रही थीं।

ढोलक की थाप पूरे गाँव में गूँज रही थी।

निरंजन भी चौपाल पर बैठा सब देख रहा था।

उसके मित्र रघुवीर ने मज़ाक किया—

“अबकी बार तेरी भी शादी करवा देते हैं।”

निरंजन हँसकर बोला—

“पहले नौकरी, फिर शादी।”

रघुवीर ने कहा—

“ज़िंदगी हमेशा हमारी योजना से नहीं चलती।”

निरंजन ने मुस्कराकर उत्तर दिया—

“मेरी चलेगी।”

वह नहीं जानता था…

ज़िंदगी ने उसके लिए पहले ही दूसरी योजना लिख रखी थी।

दिसंबर की ठंड बढ़ने लगी थी।

कोहरे की सफेद चादर सुबह देर तक खेतों पर छाई रहती।

एक शाम निरंजन कस्बे से लौट रहा था।

बस से उतरकर वह पगडंडी से घर की ओर चला।

दूर कहीं किसी ने बाँसुरी बजानी शुरू कर दी थी।

हवा में जलती लकड़ियों की गंध घुली हुई थी।

घर पहुँचा तो माँ ने गरम दाल पर घी डालकर उसके सामने रख दी।

“खा ले बेटा, ठंड बढ़ गई है।”

जगदीश झा भी पास बैठ गए।

उन्होंने धीरे से कहा—

“बेटा…”

“जी बाबूजी?”

“आदमी के पास धन हो या न हो, लेकिन उसका चरित्र कभी गरीब नहीं होना चाहिए।”

निरंजन मुस्कराया।

“आप चिंता क्यों करते हैं?”

जगदीश ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा।

“क्योंकि दुनिया आदमी को उसके काम से कम, उसके नाम से ज़्यादा पहचानती है। और नाम पर लगा दाग़ बहुत मुश्किल से मिटता है।”

निरंजन ने सहज भाव से सिर हिला दिया।

उसके लिए यह पिता की एक सामान्य सीख थी।

उसे क्या पता था…

कुछ ही दिनों बाद उसका नाम एक ऐसे आरोप से जुड़ जाएगा, जिसे मिटाने में उसकी पूरी उम्र बीत जाएगी।

उस रात वह देर तक पढ़ता रहा।

मेज़ पर रखी लालटेन की लौ कभी तेज़ होती, कभी धीमी।

बाहर सर्द हवा चल रही थी।

आँगन में तुलसी का दीपक टिमटिमा रहा था।

और दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

यह उसकी एक साधारण रात थी।

उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था…

कि अगली सुबह उसकी ज़िंदगी की आख़िरी साधारण सुबह होगी।

कल से उसके जीवन में एक ऐसा अध्याय शुरू होने वाला था, जिसे वह कभी लिखना नहीं चाहता था।

(अध्याय–1 समाप्त)

अगले अध्याय – “वह रात जिसने सब बदल दिया” में एक शहर में हुई हिंसक घटना, पुलिस की जाँच और परिस्थितियों के ऐसे मोड़ का वर्णन होगा, जहाँ पहली बार निरंजन का नाम उस मुकदमे से जुड़ता है, जो आगे चलकर उसकी पूरी ज़िंदगी की दिशा बदल देता है।