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#MNN24X7 दरभंगा,आजुक दिन के मिथिला में नववर्ष केर शुरुआत कऽ रूप में अत्यन्त श्रद्धा, विश्वास आ लोकपरंपराऽक संग मनाओल जाइत अछि। आजुक दिन के स्थानीय भाषा में जूड़ि शीतल सेहो कहल जाइत अछि। ई पाबनि मेष संक्रान्ति केर अवसर पर मनाओल जाइत अछि, जकरा शास्त्र में विषुव संक्रान्ति सेहो कहल गेल अछि।मिथिला में नववर्ष केर आरम्भ संक्रान्ति केर प्रातःकाल सँ मानल जाइत अछि, ताहि कारणे ई दिन लोकजीवन में विशेष महत्व रखैत अछि।

दान-पुण्य केर विशेष महत्व

मिथिला मे सालऽक पहिल दिन यानी जूडि शीतल केर अवसर पर दान-पुण्य केर परंपरा अत्यन्त महत्वपूर्ण मानल जाइत अछि। मान्यता अछि जे आजुक दिन साऊत (सत्तू) आ जल सँ भरल घट (घैल) दान करबा सँ विशेष पुण्य प्राप्त होइत अछि। लोक अपन-अपन सामर्थ्य अनुसार दान-पूण्य करैत छथि एकरा लेल कोनो बाध्यता नहि अछि।

सातुआ आ बासि भात केर परंपरा

आजुक दिन सातुआ खेबाक परंपरा सेहो प्रचलित अछि। एकर अतिरिक्त, संक्रान्ति केर प्रातःकाल पुरैनऽक केर पात पर बासि भात राखि भगवती के नैवेद्य अर्पित कैल जाइत अछि। एकर बाद ई भात प्रसादऽक रूप में ग्रहण कएल जाइत अछि। ई परंपरा मिथिला केर धार्मिक आ सांस्कृतिक जीवन में गहराई सँ जुड़ल अछि।

चाण्डाल संक्रान्ति केर मान्यता

एकटा मान्यता क अनुसारे संक्रान्ति के मिथिला में चाण्डाल संक्रान्ति सेहो कहल जाइत अछि। एहि दिन सँ नववर्ष केर विधिवत आरम्भ मानल जाइत अछि। धार्मिक आगम में उल्लेख अछि जे नववर्षारम्भ में चाण्डाल स्पर्श, क्रीड़ा आ भगवती केर प्रसाद रूप में मद्यपान कएल जाइत अछि। मुदा, धर्मशास्त्र में द्विजाति लेल मद्यपान निषिद्ध अछि। एही कारण सँ मद्यपान केर स्थान पर बासि भात ग्रहण करबाक परंपरा विकसित भेल अछि।

शास्त्रीय आधार आ मान्यता

धर्मशास्त्रऽक अनुसारे बासिया भात के मदिरा केर तुल्य मानल गेल अछि। यैह कारण सँ जखन एकरा पुरैनि केर पात पर राखल जाइत अछि, तखन एकर समस्त विकार नष्ट भ’ जाइत अछि आ ई शुद्ध भ’ जाइत अछि। एही आधार पर बासि भात खायबाक विधान बनाओल गेल अछि, जाहि सँ धार्मिक मर्यादा सेहो बनल रहैत अछि।

जूडि शीतल आ ‘पटेबा’ परंपरा: मिथिला में शीतलता, तृप्ति आ लोकआस्था केर अनुपम संगम

मिथिला में जूडि शीतल केवल नववर्ष केर शुरुआत नहि, बल्कि लोकजीवन, प्रकृति आ पूर्वजक प्रति श्रद्धा व्यक्त करबाक एकटा अद्भुत अवसर सेहो मानल जाइत अछि। एहि पाबनि सँ जुड़ल एक महत्वपूर्ण परंपरा अछि “बाट आ गाछ वृक्ष पटेबाक ”, जे संक्रान्ति केर अगिला दिन सँ शुरू होइत अछि। परंपरा अनुसार आब गाम-घर आ रास्ता सभ के जल सँ पटेबाक (भिजेनाई/छिड़काव) कएल जाइत अछि। लोक मानैत छथि जे गर्मी केर शुरुआत में धरती, वातावरण आ जीव-जंतु सभ के शीतलता देब अत्यन्त आवश्यक अछि।

गामक बाट (रास्ता), आँगन, घरक आगाँ-पाछाँ जल छिड़कबाक ई परंपरा प्रकृति प्रति संवेदनशीलता आ पर्यावरण संतुलन केर प्रतीक अछि। ई केवल धार्मिक क्रिया नहि, बल्कि सामाजिक रूप सँ स्वच्छता आ शीतलता बनौने रखबाक एक व्यावहारिक तरीका सेहो अछि।

तृप्ति आ पूर्वज स्मरण केर परंपरा

एहि दिन सँ जुड़ल दोसर महत्वपूर्ण पक्ष अछि पूर्वज (पितृ) के तृप्ति। मिथिला में मान्यता अछि जे एहि समय घरक भीतर जे पूर्वज छथि, हुनका तृप्त करबाक लेल विशेष विधि कएल जाइत अछि।

लोक अपन घर सँ घैल म जल ल’ क’ समाधि स्थल वा चितास्थल (चिता स्थान) पर जाइत छथि आ ओतए लकड़ी क माध्यम सं ओकरा टांगि दैत छथिन्ह जाहि सं बूंद बूंद जल खसैत रहैत अछि । ई परंपरा दर्शबैत अछि जे मिथिला में केवल जीवित लोक नहि, बल्कि पूर्वज सभ सेहो परिवारक अभिन्न हिस्सा मानल जाइत छथि। हुनकर तृप्ति आ शांति लेल ई क्रिया अत्यन्त श्रद्धा सँ कएल जाइत अछि।

संगहि लोकआस्था के एकटा गहींर सोच के सेहो दर्शबैत अछि। एक दिस ई प्रकृति के शीतलता देबाक संदेश दैत अछि, त दोसर दिस पूर्वजक प्रति कृतज्ञता आ सम्मान सेहो प्रकट करैत अछि।

एहि अवसर पर पूरा गाम एकजुट भ’ क’ ई परंपरा निभबैत अछि। छोट-नेना सँ ल’ क’ बुजुर्ग तक सभ मिलि-जुलि एहि कार्य में भाग लैत छथि। सब कियो बड़-बुजुर्ग केर आशीर्वाद लैत छथि आ परिवार संग मिलि-जुलि एहि पर्व के मनबैत छथि। बुजुर्ग जन धिया पूता आ छोट जन के माथ पर आंजुर सं जल द जुडबैत छैथ। जाहि सँ सामाजिक एकता आ पारिवारिक संबंध मजबूत होइत अछि।ई सबटा परंपरा प्रकृति, समाज आ संस्कार– तीनू के बीच संतुलन बनाक’ रखबाक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि।

एकर संगहि धुरखेल कऽ सेहो एकटा परंपरा अछि। जाहि मे साफ सुथरा पानि आ मैट’क कादो क प्रयोग कैल जाइत अछि। मिथिला में ई परंपरा केवल संस्कृति नहि, बल्कि जीवन जीबाक एकटा संवेदनशील आ वैज्ञानिक दृष्टिकोण सेहो अछि।

कहबाक तात्पर्य यैह जे जूडि शीतल केवल एकटा पर्व नहि, बल्कि मिथिला केर समृद्ध परंपरा, आस्था आ जीवनशैली केर प्रतीक अछि। ई पर्व सादगी, शीतलता आ प्रकृति संग संतुलन बनाक’ जीवन जीबाक संदेश दैत अछि।

मिथिला वासी लेल जूड शीतल अपन संस्कृति आ पहचान केर जीवंत उत्सव अछि।

(इस लेख में लेखक ने मिली जानकारी और लोक मान्यता को आधार माना है।)